• shashank_tripathi 5w

    कहने को दिल इस सीने में है धड़क रहा..
    असल में तो दबे हुए गम के ख़जाने हैं..

    तोहफ़ा खुदगर्ज़ दुनिया से है हमें मिला ऐसा..
    दिल से मुस्कुराये हुए भी बीत चुके ज़माने हैं..

    बेवक़्त नींद से उठ जाता हूं अब मैं अक्सर..
    कुछ ख़्वाब कब से अधूरे थे जो सजाने हैं..

    साथ वक़्त के लहजों को बदला है हमने..
    कुछ रुठे हुए मेरे अपने भी जो मनाने हैं..

    दिन ढल चुका शाम भी अब आने को है..
    तूफाँ से बुझ गए थे जो चिराग वो जलाने हैं..

    लौट अपने शहर जाने की बस एक तमन्ना है..
    कुछ भूले हुए से वादे भी हैं जो निभाने हैं..

    महफ़िल यारों की सजेगी फिर किसी शाम..
    उन्ही दरख्तों के साये में जो पड़े वीराने हैं..
    ©shashank_tripathi