• akumar 3w

    मुक़द्दर देते हैं

    तुम ठहरो, हम आने की अपनी ख़बर देते हैं
    तुम खंजर निकालो हम अपना सर देते हैं

    महलों की ज़िंदगी बेशक़ बख्शे ख़ुदा तुम्हें
    हम फ़क़ीर हैं पता अपना दर-ब-दर देते हैं

    वफ़ा का क़तरा भी न दे सके तुम मगर
    जो हिम्मत हो तो लो हम समंदर देते हैं

    दिखा न सके तुम आईना-ए-वफ़ा हमको
    हम आँखों को तुम्हारे वफ़ा का हर मंज़र देते हैं

    चंद लम्हे भी न थे तुम्हारे पास हमें देने के लिए
    तेरे इश्क़ में हम अपना शाम-ओ-सहर देते हैं

    दहलीज़ पार कर सको तो कभी हौसला करना
    आओ हमारे घर तुम्हें अपना शहर देते हैं

    इश्क़ की बात थी जो तुम्हें ना-गवार गुज़री
    हम इन्तेहा-ए-इश्क़ में अपना मुक़द्दर देते हैं


    ©अश्विनी कुमार