• mrbhardwaj 6w

    वक़्त

    घड़ी की सुईयों को निकालकर,
    दीवार पर टांग दिया है मैंने ,
    सोचा शायद ये वक़्त थोड़ा ठहर जाए,
    या आकर मिले मुझसे और मेरी इन
    नादानियों पर अठखेलियां लगाए।
    या बताये मुझे वक़्त के साथ यादों के भूलने के कुछ सबक़
    कि अब सबकुछ याद रखना किसी श्राप से कम नहीं लगता।
    कि शायद इन दिनों वक़्त सँभल गया है मेरा,
    दर्द देखकर शायद पिघल गया है थोड़ा,
    दीवार पर टिक-टिक करता रुक गया है थोड़ा,
    आजकल कुछ याराना सा बन गया है मेरा,
    कि जब आजकल दर्द, दर्द से बढ़ जाया करता है,
    ये वक़्त ही है जो चुपके से हौले से मुझे समझता है,
    कहता है कि नियति है मेरी बदलना,
    फिर तू क्यों इतना घबराता है,
    कि जब वो वक़्त की थपेड़ों से मुझे सुलाता है,
    तब लगता है वक़्त बदल रहा है मेरा।
    ©mrbhardwaj