• antrish 14w

    खिड़कियां

    आओ, ज़रा खिड़कियों से झांकते है
    बाहर जो विखरी पड़ी खुशिया है
    उन्हें सवारते है।

    कही कोने मैं बैठा वो बचपन है
    डरा सा, घबराया सा
    उसे सहलाते है
    उसे पुकारते है।

    फिर कहीँ होगी वो
    तरह तरह के खिलौने की दुकान
    चल ज़रा उसको झांकते है
    सपने सजाते है।

    वही कहीँ गलियो मैं
    खोयी हुई गेंद होंगी
    आ उठा ले उसे
    और फिर कांच तोड़ के आते है।

    आज धूप बड़ी खिली सी है
    चल दौड़ लगते है
    किताबो के बास्ते खोल
    काजज का प्लेन बनाते है।
    .
    फिर उड़ जाएंगे इस सपने मैं ही कहीँ
    जहां ना दीवारे हो।
    इस खिड़की के बाहर की दुनिया की
    खुशियो मैं जी जाते है।

    ©iamnemo