• agoree 5w

    लिखता हू कब्र से ..

    किया था इश्क हमने भी एक बार ,
    नय जमाने वाला नही यार ।
    देह आकर्षण से वह कहीं अधिक था ।
    दिखावे का नही ,
    मगर सच्चा एवं सही ।
    मोबाइल तब न आया था ,
    साथी खत को मेंने पाया था ।
    जवाब में हमेशा कोरा खत उनका आया ।
    बिना शब्दों के उन्होंने बहुत कुछ बताया ।

    हमारे रिश्ते की भनक लोगों को लग गई ,
    भ्रमित समाज की झूठी नाक कट गई ।
    पूछा उन्होंने अलग जाति के होकर इश्क करते हो
    शर्म नही आती ,
    मैंने समझाया आशिकी में जात धर्म नही देखी जाती ।
    बहुत मारा उन समाज के रखवालों ने,
    अलग किया हमे अपने ही घरवालों ने ।
    शरीर का दर्द तो सह गया यारों,
    विरह का दर्द न सह पाया ,
    अगले ही दिन घर उसके मैं पहुंच आया ।

    आंखों में उसकी प्रेम वह मेरे लिए चिंता थी,
    आखिर दिल से तो वो मेरी थी ।
    फिर मारा उसके परिजनों ने बहुत।
    अथक प्रयासों के बाद भी वो उन्हे न रोक पाई ।
    बावजूद इसके मेंने उससे नजर न हटाई ।
    बिचारा शरीर भी इस बार साथ नहीं दे पाया ,
    कुछ क्षण में उन्होंने मुझे मृत पाया ।
    यह देख शरीर उसका भी जडत्व को प्राप्त हो गया ,
    आंसुओ के सिवा कोई हलचल न दे पाया ।

    आज शव हम दोनों हि है । अंतर बस इतना है ,
    मैं कब्र में हू और वो बहार है ।।


    ©agoree