• kavish_kumar 18w

    Humanity

    मैं तुम में ही हूं, अभी परित्यक्त नही हूं..

    तुमने परदा किया है, इसलिए अभिव्यक्त नहीं हूं..

    कुछ बुद्धिजीवियों ने तेजाब डाल रखा है जड़ों में...

    इंसान में होकर भी, आजकल इतनी सशक्त नहीं हूं..

    © Kavish