• samarrai 16w

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    मेरी खिड़की से कुछ यादें झाँक रही हैं,
    वो कुछ कड़वी ,कुछ मीठी,बची राख़ सी।

    आवाजें जो गूँज रही है बन्द कमरे में,
    कुछ रहस्यमयी, कुछ झूठी,कुछ सच्ची बेबाक सी।

    वो किनारे से एक धुँवा सा आ रहा हैं,
    कुछ कह रहा है ,कुछ समझा रहा हैं।

    वो रोक रहा है मुझें,अपने स्मृति के पार जाने से ,
    कहता है, सिर्फ दुख मिलेगा यादों में खो जाने से ,

    खिड़की से सिर्फ हवा, प्रकाश नही आते ,मै जान गया हूँ,
    कुछ बीती यादें भी आती है मै ये मान गया हूं।

    तुम भी कभी बैठो इसके पास ,सब जान जाओगे,
    महसूस करोगे यादों को ,मेरी बाते मान जाओगे।

    बस तुम अपने आप को उन यादों में खो मत देना,
    उन बीती बातों को याद कर रो मत देना।

    अगर तुम्हें लगे की तुम खो रहे हो,
    आँख भर आयी है और तुम रो रहे हो।

    तुम उस आवाज को मत सुनना,
    धिरे से अपनी खिड़की बन्द कर देना।

    क्योकि ,खिड़की से कुछ यादें झाँक रही हैं,
    वो कुछ कड़वी, कुछ मीठी बची रख सी।
    ©samarrai