• shubham_patodia 6w

    इबादत शक्सियत नहीं बदलती,
    फिर बुराई तब्बसुम के संग क्यों जिए,
    रंग-ए-लम्स झलक रहे हो जहाँ,
    हम बेख़ुदी के संग क्यों जिए।
    मुकम्मल हो गया सच,
    दीवार-ओ-दर से बहार आते ही,
    राहगुजर से पूछ लिया,
    तमन्नाओं के हम-ख़याल होते ही।
    गुज़रे हुए लम्हों के बाद,
    खत्म हुए दुनिया के झमेले,
    गम-ए-जहाँ के गुज़रते ही,
    हम जिन्दा हैं मरने को अकेले।
    हम जिन्दा हैं मरने को अकेले।।

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    इबादत शक्सियत नहीं बदलती,
    फिर बुराई तब्बसुम के संग क्यों जिए,
    रंग-ए-लम्स झलक रहे हो जहाँ,
    हम बेख़ुदी के संग क्यों जिए।
    मुकम्मल हो गया सच,
    दीवार-ओ-दर से बहार आते ही,
    राहगुजर से पूछ लिया,
    तमन्नाओं के हम-ख़याल होते ही।
    गुज़रे हुए लम्हों के बाद,
    खत्म हुए दुनिया के झमेले,
    गम-ए-जहाँ के गुज़रते ही,
    हम जिन्दा हैं मरने को अकेले।
    हम जिन्दा हैं मरने को अकेले।।
    ©shubham_patodia