• sagar536 23w

    राह बदलदी

    फिर क्यू ऐक राही ने राह बदलदी...
    बनके गुमसुम चाह बदलदी ...

    सामना ना कर सका तो क्या ...
    उसने भी अपनी सोच बदलदी

    पता हे तुम्हें की मंज़िल तेरी क्या हे ....
    फिर भी क्यू नहीं तूने मायूसी बदलदी ..

    आप से होके बना जेसे प्यारा में ....
    तो ऐ दोस्त सी तू, क्यूँ तूने बात बदलदी ...

    राह मे फूल नहीं भी तो क्या हुवा! ...
    ऐसी सोच मे लगता हे राह बदलदी

    फिर क्यू ऐक राही ने राह बदलदी...
    बनके गुमसुम चाह बदलदी .
    - सागर पंड्या