• rooh_writes 23w

    एक पूरा आसमा था जो मैंने तुम्हारे नाम कर दिया था,
    और खुद ज़मीन पर ठहरी रही थी मैं...
    तुम्हारे हौसलों की वो उड़ान जो तुम्हें बादलों के पार ले गई थी,
    उसपर सिर्फ तुम्हारा हक़ नहीं थी. वो मेरा भी गुरूर था...
    और तुम्हें तो अब शायद याद भी ना हो,
    तुम्हारे पंखों की हिमाकत भी, मेरे इश्क़ की ही बानगी थी...
    खैर, सब सहेज कर, तुम चले ही गए. कुछ कतरनें मेरी भी ले गए.
    अब मैं किसको दोष दूँ?
    मेरे मुजरिमों की फेहरिस्त में कोई भी नहीं है....
    ना कोई आसमा, ना तुम्हारी उड़ान, ना मेरा इश्क़.
    ना मैं. ना तुम.
    शायद बुलंदियों की तासीर होती ही ऐसी है.
    बिल्कुल खोखली.
    यकीन की तरह.


    ©rooh_writes