• harshit_s 22w

    तुम क्या कोशिश करते हो,, मुझे मापने की,,
    मै तो खुद में ही बदनाम हूँ।।
    यादों के जज़्बातों की नीलामी करके
    झूठ में फँसी नीची जाति की भावी लोमड़ी
    मै यूहीं नही कहलाता,,
    मै ऐसे ही लेखक नही बन जाता।।
    क्योंकि वफ़ा तो एक झूठ है,,
    मगर उम्मीद तो लाज़मी है जनाब,,
    आज के उजाले मे,,
    ना जाने क्यों कल का अँधेरा ढूंढता हूँ,,
    मन का सन्नाटा न जाने क्यों
    चीख चीख के उस अँधेरे को ताकता है।।
    खुद को इस असमंझस से
    ऐसे ही नहीं सम्भाल पाता,,
    मै यूहीं नही लेखक बन जाता।।

    ©हर्षित_एस