• vasubandhu 16w

    उम्मीद

    मंजील को हम दुर सें ही देखा किये, सोचा चलते जाएंगे। चाहे हो गर्म धुप के दिन या सर्द काली रात, आगे बढते जाएंगे।

    आचल के सपने बिखर के ही रह गये, उम्मीद का दामन फटा सा ही पाया। चलते हुए एक मोड आया, राहों में खुबसुरत कई पडाव लाया।

    मौकापरस्त पर जो निकला यु देखो, पलक झपकते ही आंसु ले आया। विश्वास की तोडी जो एेसी कमर के, भरोसा अपना हमनेे बैसाखी पे पाया।

    चले जो आगे और इक मोड आया, खुशबु खुशनुमा वो संग अपने लाया। बैसाखी ओ दामन बिखरते चले अब, यु मोड पे जाना गवारा ना पाया।

    खडे है अभी तक हम सदके मे रह कर, जो किस्सा पुराना नया रंग लाया। ना मुडते संभलते ना कदम रख सकेंगे, सुहावने उस मोड को ये कैसे कहेंगे।

    तरसते है हम तो मोड भी है ये उलझा, गूजरते हुए सब तो जाने चले है। बजाकर अब ताली वो हसके चले है, नही साथ कोई तरसके थके है।

    के जाए ना जाए कसक मे खडे है, दबे पाव आसु सिमट के पडे है। जो देखा हमे मोड झांसे मे आया, सावन मे पतझड़ अचानक ही लाया।

    तमन्ना नही और चलने की हमको, पर चलना ही होगा। सहारा उम्मीद का हमको होना ही होगा, के मोड है हमको तकना ही होगा।

    कही तो मिलेगी जो मंजील कहेंगे, उम्मीद मोड का ताना बाना कहेंगे।
    ©Vasubandhu