• baisamumal 12w

    कटु सत्य

    निःशब्द हो गई है जुबान
    शब्द लड़खड़ा कर कहीं बिखर गए
    देखे थे जो सपने तुने तेरे साथ ही चले गए
    किसे पुकारेगा वो आँगन
    किसे ढुँढेगा वो बादल
    बूढ़ी माँ की लोरी सुनेगा कौन
    बूढ़े बाबा की डाँट सहेगा कौन
    विराना हो गया होगा वो चौक
    जहाँ यारों की महफिल लगती थी
    हँसी ठिठोली की बातें गूँजती थी जहाँ
    वो मयखाने अब बंद हो जाएँगे
    देखा जो सूनी कलाइयों को
    दिल मेरा रो उठा
    तुतलाती आवाज में पुकारती 'पापा'
    आज ढूंढें तेरी काया
    एक ही पल में बदल गया सबकुछ
    उठ गया तेरे अपनों पर से तेरा साया
    शांत जुबान न कुछ कहना चाहती है
    व्यथित मन को तड़पा जाती है
    किसे कहेगी दुख अपना' वह'
    ये सोच कलम मेरी भी ठहर सी जाती है।