• kishore_nagpal 14w

    एक साधक को जो आनंद प्रभु की कृपा से मिली परिस्थति में आता है, फिर चाहे वह परिस्थति अनुकूल हो, या प्रतिकूल, और चाहे कितनी ही प्रतिकूल क्यो ना हो.....
    वह आनंद प्रभु से अपनी बात मनवा लेने में कहा आता है ।

    प्रभु की इच्छा में खुश रहना ही एक साधक का चरमोत्कर्ष.....।

    इसलिये एक साधक जीवन मे चाहे कितनी ही विषम परिस्थति क्यो ना आये प्रभु से प्रार्थना मे भी अपने लिये या अपनो के लिये कुछ नही माँगता है । सिर्फ प्रभु की कृपा ।

    हर पल, हर क्षण, एक ही भाव....
    हे रामममममम्
    तेरा भाणा मिठ्ठा लागे।।
    ©kishore_nagpal