• sadique_hussain 5w

    To be continued....

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    (सहीफ़ा-ए-सादिक़ 1)

    शब सुलाया नहीं गया जैसे कभी सुलाया नहीं गया!!
    सहर जगाया नहीं गया फ़िर कभी जगाया नहीं गया,

    आज लाई ‌है क़िस्मत हमें उस अजनबी मक़ाम पर
    जहां लाया नहीं गया कोई कभी लाया नहीं गया,

    लुटेरे ने भी था लूटा हर दफ़ा मेरे ज़ीस्त का वो कोना,
    जहां चुराया नहीं गया कुछ भी कभी चुराया नहीं गया

    सर-ए-राह सबीक़ हमनवा से मिल गई थी यूं नज़र,
    कभी मिलाया नही गया उनसे कभी मिलाया नहीं गया,

    कहने को फ़ासला महज़ क़दम दो क़दम था दरम्यां,
    क़दम बढ़ाया नहीं गया उनसे कभी बढ़ाया नहीं गया,

    शब-ए-मैहताब-ओ-नूर-ए-क़मर-ओ-जलवा-ए-यार,
    कभी दिखाया नहीं गया उनसे कभी दिखाया नहीं गया,

    हम बनाएं क्या तसवीर या मुजस्सम उनसा हसीं‌ कोई,
    जब बनाया नहीं गया ख़ुदा से कभी बनाया नहीं गया,

    रह कब गए थे महफ़ूज़ हम बर्क़-ए-हुस्न-ए-यार से,
    हमे जलाया नहीं गया गोया कभी जलाया नहीं गया!

    नाम उनका दिल पे गोया हर्फ़-ए-मुक़र्र से लिख दिया,
    जिसे मिटाया नहीं गया वो फ़िर कभी मिटाया नहीं गया,

    हराया है ख़ुद के दिल ने जंग-ए-दिल-ओ-दिल में यूं हमें,
    हमें हराया नहीं गया,जैसे पहले कभी हराया नहीं गया,
    ©sadique