• _daakhil_ 5w

    धूप मुट्ठी में भरो जाओ अँधेरों पर गिरा दो
    बचपना छोड़ो हटाओ मिट्टियों के घर गिरा दो

    इस ख़िज़ां ने रंग ख़ुशबू गुल नज़ारे खा लिए हैं
    गुलशनों में उड़ रही ऐ तितलियों तुम पर गिरा दो

    मुद्दतों से फ़ासले हैं दरमियाँ इनको मिटाकर
    आज कुछ ऐसा करो धरती पे' ये अम्बर गिरा दो

    बस इसी उम्मीद से पटका करो माथा हमेशा
    उस जगह से लौट आए इस शहर भी सर गिरा दो

    मर गया "दाख़िल" बड़ा ही नेक बन्दा था ख़ुदा का
    खूब रो लो इक दफ़ा फिर लाश पर चद्दर गिरा दो

    ©_daakhil_