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    चाय बन गई क्या?

    एक अर्सा हो गया है,
    इन भोली बिखरी बातो को,
    हर सुबह टटोलते रहे,
    हम रेत यूं ही कही धूप में
    ख्वाब में न आई तो
    हम बिस्तर बदलते रहे..

    कुछ उनकी याद में,
    कुछ उनके इंतज़ार में...

    पर वो आई एक सुबह की तरह,
    दूध की आड़ में, खामोशी की बाड़ में,
    और कम्बख्त हम चुस्किया और चाय ढूंढते रहे!


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