• kanha007 5w

    "माँ"

    मानलो गर मैं एक मकान हूं..
    तो वो, वो चट्टान है जिससे टूटकर मैं बना हूं..
    जिससे बनी ईठें मेरी दीवारों में सांस लेतीं हैं !
    है वो नीव मेरी ये जो बोझ मेरा हर दम सेहती है !

    मानलो गर मैं एक फरिश्ता हूं..
    तो वो, वो भगवान है जिसने मुझे पाला है..
    जिसके कोमल हाथों का हर दम मुझपे साया है..
    इस दूआएं देने वाले फरिश्ते के सर पे जिसकी दूआएं हर दम रहती है..
    जिसकी लोरी से मेरी सुबह-ओ-शाम जागती और ढलती हैं..

    मानलो गर मैं एक कविता हूं
    तो वो उस कलम की श्याही है
    जिसने कुछ सबसे उम्दा कलम लिखे हैं !

    मानलो गर मैं तुम्हारा आशिक़ हूं..
    तो वो वो है जिसने मुझे आशिकी सिखाई है
    बेवफ़ाई नहीं ! उसने मुझे वफाई बतलाई है !

    दिल से कोमल
    मन से शीतल
    कभी खतरनाक
    तो कभी थोड़ी रोचक है..
    "माँ" मेरी है, वो मेरी संकटमोचक है !
    बस भोलेपन में उसके में भी भोला सा थोड़ा हो गया
    इसी वजह से तो उसे समझ पाने से थोड़ा रह गया..
    पर चलो ठीक है, माना उसे ना सही
    पर खुद को ही मैं थोड़ा समझ गया..
    और अगर समझ भी लेता तो यहां क्या होता ?
    ना मेरा ये हिस्सा थोड़ा यहां होता..
    ना ये किस्सा किसी ने सुना होता..
    और हां ज़रा ये भी तो सोचो !
    की ये सलाम और सम्मान
    मैंने अपनी "माँ" को, क्या यूं कभी दिया होता ?
    ©kanha007