• pragatisheel_sadhak_bihari 14w

    चाहतें!

    चाहतें!हर रोज..........................सुबह में आराम ढूँढती है
    पर जरूरतें हमारे.........................दौड़-ए-पैगाम धरती है

    भागता फिरे जो शहर-शहर.......समेटे आँखों में वैराग्य पहर
    देख उसके इरादे गम तब.........आराम को हराम समझती है

    कहर हमारे कुकृत्य का...प्रकृति को नारुष्ट करती है,तभी वो
    देकर अनगिनत थपेड़े,करने को हमें मानवीय काम कहती है

    दर-दर खाई ठोकरें गवाह है होता......हम बेहद तकलीफ़ में
    फिर नाहक सीना "मैं" को...........अहं संग बदनाम करती है

    आचरण रवैया मापी है जाती बुरे वक्त में यारों!...तो सब्र रख
    वरना चंद हार से ही ज़िन्दगी,हमारे नाम को गुमनाम करती है

    आहत है कौन नहीं यहाँ.........कुछ मेरे तो कुछ उनके भी दर्द
    तभी आँसू.............ज़िन्दगी जीने के लिये कलाम लिखती है

    "साधक".............गहन अभ्यास ही होती हमारी इकलौती पूंजी
    वरना थाम गैरों की उंगलियां....मंजिल नहीं सलाम करती है

    ©gatisheel_sadhak_bihari