• kishore_nagpal 6w

    जीवन भर हम अपने आप को व्यस्त रखते है, मानो अपने मन को समझाते है, मानो स्वयं का हम खुद ही justification करते है, कि हमारे पास समय नही है, जप, तप ध्यान, साधना के लिये।

    हम अपने आप को ही समझाते है,
    जीवन भर काम करना होता है, बच्चो की पढाई, बच्चो का कैरियर, अपनी पत्नी और माँ पिताजी का ध्यान, अपने समाज और मित्रो से निभाना, अपना घर, अपनी गाडी, अपना कैरियर...आदि आदि...।।

    और जीवन भर हम खुश होकर यह सब करते रहते है, और स्वयं को ही परिभाषित और छद्म रुप से संतुष्ट भी करते है कि हम ये सब जिम्मेदारियाँ निभा रहे है ।

    पूरे जीवनभर इन जिम्मेदारियो को निभाने का जैसे उत्सव मनाते है हम ।

    इन सब के बीच दिन का कुछ समय साधना (राम जी ही जाने) और दिन मे कुछ देर online कुछ msgs, कुछ comments....

    हमारे पिछले जन्मो और इस जन्म के भी पापो को काटने के लिये क्या यही सब पर्याप्त ।

    अर्थात हम निश्चित तौर पर अगली योनि की ही तैयारी कर रहे है, वह भी बिना किसी डर के, कि ना जाने कौन सी योनि मिले।

    जब हमारे जीवन का अंतिम समय आयेगा, जब गुरुदेव स्वयं हमे लेने के लिये आयेंगें, जब हमारे इस जीवन भर के, इस मानव शरीर के दुख रोग, कष्ट क्लेश, राग द्वेष आदि से हम मुक्त हो रहे होंगें........उस समय को,
    उस उत्सव को हम जीवन का सबसे बडा उत्सव क्यो नही मान सकते । आखिर मृत्यु हमारे लिये एक बुरा समाचार या दुख या अवसाद या कष्ट या का विषय कैसे हो सकता है ।जीवन भर गुरुजनो का प्रेम और प्रभु की आराधना करके इस मृत्यु के समय को उनके साथ मिलन का
    महा उत्सव क्यो नही मान सकते हम।

    सब कुछ हमारे मन की खोटी चाले है । जीवन भर अपने आप को जिम्मेदारीयाँ निभाने के नाम पर स्वयं की मन चाही परिस्थतियो मे जीवन व्यतीत करते और नाम मात्र की साधना करते हुये हम स्वयं को गर्वित और समझदार भी महसूस करते रहते है।

    और फिर 84 लाख योनियो का फेर...........

    ईश्वर स्वरुप ही गुरुजनो के मिलने के बाद भी इस तरह मानव योनि को व्यर्थ गँवाना तो वैसा ही ना जैसे स्वयं प्रभु दरवाजे पर खडे होकर द्वार खट खटा रहे है और किशोर द्वार बंद करके अंदर बैठा है।

    कृपा कीजिये
    मेरे महाराज श्री
    किशोर साधना पथ पर चल सके।

    ©kishore_nagpal