• manish_mishra 15w

    उन सितारों को देखते हुए,
    कभी कभी ऐसा लगता है मानो,
    जैसे अपना भूत देख रहा हूँ,
    वो तारा तब भी था,
    जब मै खिलखिलाकर हँसता था,
    जब माँ की गोद में,
    बिलख कर रोता था,
    नादान सा तितलियों को पकड़ता था,
    तो एक छोटी सी चींटी से डर जाता था,
    आम की उस डाल को देखते हुए,
    वो बचपन याद आ जाता है,
    जब मै उस झूले को पकड़ कर,
    आसमान को पकड़ने की कोशिश करता था,
    पंख ना होते हुए,
    मेरा "मन" पंछी से भी ऊंचा उड़ता था,
    पर अब,
    वो डाल तो है, मैं भी हूँ,
    पर ना ही वो झूला है,
    और ना ही वो बचपन,
    उन सड़को को देखते हुए,
    कभी कभी वो यादे याद आ जाती है,
    जब मै, और वो,
    साइकिल की टायर को,
    डंडे से मारते कितना दूर निकल जाते थे,
    और फिर थक कर,
    एक दूसरे के कंधे में हाथ डाले,
    थकते हुए घर आते थे,
    आज भी वो रास्ते सारी यादे,
    अपनी दूरी मे समाए रखे हुए है,
    आज वो सड़के तो है, पर
    थोड़ी बदल सी गयी है,
    बिल्कुल हमारे दोस्ती की तरह,
    चाचा कि दुकान पर नजर पड़ते ही,
    मुझे वो चवन्नी याद आ जाती है,
    जिससे मै अपनी खुशियाँ खरीद लेता था,
    चार आने मे भी जन्नत समेट लेता था,
    दुकान आज भी है,
    पर ना ही चाचा है, ना ही चवन्नी,
    अपने घर को को निहारते हुए,
    कभी कभी वो पुरानी,
    मिट्टी की दीवारें याद आ जाती है,
    जब रौशनी के लिए,
    लालटेन, दिया-सलाई था,
    और तब घर की दीवारें,
    भले ही कमजोर थी,
    पर उसने अपने अंदर,
    रिश्ते मजबूत पिरो रखे थे,
    आज मकान वहीं है, दीवारें भी वहीं हैं,
    पर चूल्हे घर मे चार है,
    आज हर चीज है तो वहीं है,
    पर सब कुछ थोड़ा बदल सा गया है,
    और मेरा बचपन,
    वो तो ना जाने कहीं खो सा गया है।
    ©manish_mishra





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