• shaill 6w

    तरकश

    जब कभी सोंचता हूँ कि शब्दों से
    उकेर कर जीवन की तसवीर बनाऊँ,
    शब्दों की भीड़ में जज्बात ढूंढता हूँ
    मुखोटों के पीछे की तस्वीर उकेरता हूँ।

    कहीं भटक अर्थविहीन न हो जाऊं
    शब्दों में नित्य नए अर्थ रूपी रंग ढूंढता हूँ,
    कभी किसी अंतर्मन की व्यथा से रच कर
    समाजिक बदलाव की दशा उकेरता हूँ।

    शब्द रूपी वाण तरकश से निकाल
    नित्य नए निशाने को भेदता हूँ,
    किसी को भाता किसी को चुभता हूँ
    इंसान हूँ इंसान में इंसानियत ढूंढता हूँ।
    शैल.....