• nehulatagarg 13w

    बातों का कोई जवाब तक नहीं दिया आपने और हम कोशिशें करते रहें और आप मौन धारण किये बैठे रहें वो भी तब जब आप जानते थे की , हमें मौनव्रत का दण्ड स्वीकार नहीं है कभी भी तो , अब आपका दण्ड यही है की , आप अभी प्रतीक्षा ही कीजिए क्योंकि इतनी शीघ्रता से तो हम मानने वाले है नहीं तो चलते है हम । चित्रांगद अंगना को जबरदस्ती खींचते है और अंगना बिस्तर पर चित्त गिर पडती है और चित्रांगद उनकी उठने की कोशिशों को नाकाम करते हुए कहने लगते है और अंगना शर्म और झिझक सी दोहरी होती जाती है और चेहरे पर मुस्कुराहट भी शर्म और रूमानी अहसासों से सरोबार होने लगती है और चित्रांगद से गुजारिश करने लगती है वो की , वो उन्हें जाने दें क्योंकि श्री माँ उनका इंतजार कर रही होगी और अगर वो सही वक्त नहीं पहुंची तो अभी वो उन्हें बुलाने भी आ जायेगी लेकिन चित्रांगद उनकी एक नहीं सुनते और उन्हें अपनी आगोश में लिये अपने प्यार की गहराईयों में खोने ही वाले होते है की , तभी द्वार पर दस्तक होती है और बाहर प्रभावती अंगना को पुकार रही होती है और उनकी पुकार सुनकर जो अंगना निढाल सी समर्पित थी चित्रांगद के प्रति उस पुकार से जैसे खुशी से उछल पडती है और चित्रांगद से कहने लगती है चहकती हुयी उन्हें उनके कहें के अनसुना करने की भूल का अहसास कराती हुयी - देखा आपने , हमने कहा था ना आपसे लेकिन आप नहीं मानें । प्रभावती द्वार पर दस्तक बढाती जाती है और चित्रांगद इसे अनसुना करने के लिये अंगना से कहने लगते है लेकिन अंगना नहीं मानती । प्रभावती अन्दर आकर देखती है तो देखती ही रह जाती है और वो अंगना के पास पहुंचती है और उनसे पूछने लगती है - पुत्री ! इतनी भीषण गर्मी में भी आप चादर लपेटकर क्यों बैठी हुयी है ? और यह सुनकर चित्रांगद और अंगना उलझन में पड जाते है और दोनों को कोई जवाब नहीं सुझता लेकिन जब बार - बार वो दोनों से इसका कारण पूछने लगती है तो अंगना बहाना बनाती हुयी कहने लगती है - वो हमें बहुत सर्दी सी लग रही है तो इसी कारण

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    चित्रांगना

    हमने यह चादर लपेटी हुयी है तो प्रभावती अंगना के सर को छूकर देखने ही वाली होती है कि , अंगना जल्दी से भागकर स्नान कक्ष की तरफ चली जाती है । प्रभावती के साथ चित्रांगद भी हैरानी से अनजान होने का अभिनय करते है । कुटूम्ब कक्ष में सब बैठे रहते है और भाग्य श्री बताने लगती है की , कल प्रातः काल से ही अंगना और चित्रांगद के विवाह की रस्में शुरू हो जायेंगी और पूरे एक माह तक दोनों को ना ही एक - दूसरे से मिलने दिया जायेगा और ना ही एक - दूसरे को देखने दिया जायेगा और यह सुनकर चित्रांगद सकते में आ जाते है और घबरायें से कहने लगते है अचरज से भरे - एक माह कुछ ज्यादा नहीं है .. नहीं हमारे कहने का तात्पर्य है की , इतने दिवस तक विवाह की रस्में कुछ ज्यादा ही विलम्ब नहीं करेंगी तो महालक्ष्मी कहने लगती है - बिल्कुल नहीं पुत्र बल्कि यह सारी रस्में है ही ऐसी की , आपको पूरे एक माह तो लग ही जायेंगे इनके पूर्ण होने तक के लिये तो प्रतीक्षा तो आपको करनी ही होगी और रस्मों को भी पूरे माह निभाना ही होगा और असंधिमित्रा कहने लगती है , हाँ अगर आपको आपत्ति है तो .. चित्रांगद खुश होते है की , शायद दिवस कम कर दियें जायें तो वो चहकते हुए कहने लगते है - .. तो क्या बडी माँ तो असंधिमित्रा कहने लगती है - तो हम एक माह मेंं कुछ दिवस और जोड देंगे यदि आपने शीघ्रता की तो और यह सुनकर चित्रांगद मन मसोसकर रह जाते है । एक कक्ष में अंगना को लाया जाता है जहाँ देवी अंगना के साथ - साथ चित्रांगद के दादा - परदादा समेत सात वंशजों की प्रतिमाऐं होती है धातुओं की बनी और अंगना से सबके पास रखें हुए दीयों को जलवाया जाता है ताकि उन सबका आशीर्वाद उन्हें मिलें और फिर एक विशेष प्रकार की खीर उन्हें महालक्ष्मी खिलाती है देवी अंगना की प्रतिमा के सामने नीचे फर्श पर बैठाकर क्योंकि अगर देवी अंगना होती तो वो यह रस्म निभाती और इसके पीछे की सोच यह होती है की , जो मिठास इस खीर में है वैसी ही मिठास अंगना इस परिवार में बनाये रखें सम्बंधों के बीच । उसके बाद प्रभावती उन्हें अपने कक्ष में लाती