• sahity 23w

    छोड़ दिया है तकिये को बिस्तर के किसी कोने में
    नींद तो आती है लेकिन अब फ़ुरसत कहाँ है सोने में

    कितनी रातों को बेच दिया, एक ख्वाब खरीदने की ख़ातिर
    अनगिनत लम्हों में हारा हूँ, अपना वक़्त जीतने की ख़ातिर

    कागज़-कलम के किस्से मानो जैसे कल की बात हुई
    जिन्हें ठीक से न जान सके, ऐसे कितनों से मुलाक़ात हुई
    शाम की ठंडक अब कलेजे को छू भी नहीं पाती है
    पता नहीं चलता कब दिन बीता कब रात हुई

    पर सफ़र खत्म करने की ख़्वाहिश ज़िंदा मुझ को रखती है
    कदम बढ़ाता रहता हूँ, फिर भी मंज़िल दूर क्यों लगती है

    ख़्वाब है एक दिन चारो तरफ मेरा ही शोर रहेगा
    तब जो भी अब तक खोया है, वो मेरे ही ओर रहेगा


    ©kapil_dew