• babershaik 16w

    कोफ्त

    ज़न्दगी सब की एक जैसी होती है।
    इस में उल्झानेवाले भी होते हँ और सुल्झानेवाले भी।
    किसी को कोइ क्यों उल्झाता है। और किसी को कोइ क्यों सुल्झाता है।
    अगर ज़न्दगी में सिर्फ उल्झनें होती तो
    ज़न्दगी मैदाने जंग होती और अगर उल्झनें ना होती तो सिर्फ सुल्झेहूए लोग होते।
    ए तो अपनी अपनी फितर्थ पे जाता है कि कोन किसको क्यों उल्झाता है। कोइ अपनी अना कि ख़ातीर उल्झाता है या फिर एक दूसरे को ज़न्दगी में सब्ख़त लेजाने की ख़ातीर उल्झाता है।
    उल्झनें कोइ क्यों सुल्झाता है।
    वही उल्झनें सुल्झातें हँ जो जिसे हम अपना मानते हँ या जो हमारे ख़रीब होते हँ।
    जो ऩफ्रत करते हँ वह उल्झाते हँ।
    जो मुहब्बत करते हँ वह सुल्झाते हँ।
    मुहब्बत और ऩफ्रत दो एसे हथियार हैं
    जिसे हर कोइ अपनी ज़न्दगी की जंग में
    इस्तेमाल करता है।
    ए अपने उपर होता है की किस तरह उल्झनों
    दूर रक्खा जाए और अपनी ज़न्दगीयों को ख़ुशग्वार बनायाजाए।
    ©babershaik