• akashsishania 16w

    अस्तित्व ( be unique )

    रात के उस धुंधलेपन मे बाकी था कुछ साफ़ सा ...
    पलकों पे बैठा था मेरे बनके वो एक ख्वाब सा...
    बदलो मे छुपा था लेकिन चाँद भी था अपनी अकड़ मे...
    सोचा सब कुछ करलु हासिल पर कोई तारा ना आया पकड़ मे...
    कुछ हलकी बूंदे जिस्म को पूरी तरह भीगा गयी...
    मन मे आया की चलो आज बंजर मे बारिश आ गयी...
    पड़ी नज़र फिर उस पत्ते पे जो लेहेराय झोके से....
    बैठे बैठे फिर आया दिल मे मै ही क्यों दूर हु हर मौके से...
    सोचा था पहले की चाँद बनूँगा, वो भी तो अकेला है...
    पर फिर उसकी हालत देखि तो, साला वो भी थकेला है...
    सूरज बनना लगा ठीक, जब रौशनी देखि चमकती...
    फिर उसकी भी हालत बेकार, जब ना कोई आत्मा भी नज़दीक भटकती...
    छोडा फिर हमने अपने को वक्त के ही हाल पे...
    क्युकी बनना चाहा किसी की तरह तो चाटा हमेशा पड़ा गाल पे...
    अपनी खुद की पहचान ना खोना किसी की तरह बनने की कोशिश मे...
    दुनिया बोहत ज़ालिम है यारो, लगी रहती है सिर्फ साज़िश मे...

    ©आकाशसिशानिआ