• satya_145 10w

    मझधार मे कश्ती

    मझधार मे कश्ती डोल रही ,
    और दूर बहुत किनारा है ।
    प्यास विवश है सीने मे ,
    ये सागर सारा खारा है !॥1॥
    चला चली के खेले मे
    थका पथिक यू चलता है
    बीता वक्त ज्यू बहता पानी "सत्य "
    जीवन तो चलती धारा है ॥2॥
    झनक झनक धमक धमक ,
    पायल ,तबले पर बाजे है
    साज बाज की इस रौनक
    पर ,जीवित ये इकतारा है ॥3॥
    रंग मंच का दर्पण झूठा था।
    छाया से साया रुठा था ॥
    अब अर्पण दर्पण कर बैठा हूँ ।
    एक समर्पण कर बैठा हूँ ॥
    जीवन की इस धूप छाँव मे ।
    अभिनय ही एक सहारा है ॥4॥

    ढूँढ़ रहा हूँ एक अदद सच ।
    दर -ब -दर और गली गली ॥
    झूठा सच और सच्चा झूठा ।
    दुनिया मे ये रीत चली॥
    दम्भ तो पाया सिंहासन पर।
    और सत्य खड़ा बेचारा है ॥5॥
    मझधार मे कश्ती डोल रही
    और दूर बहुत किनारा है .......
    सत्य प्रकाश शर्मा सत्य "