• arundvn2 5w

    उठो द्रोपदी ...

    उठो द्रोपदी वस्त्र सम्भालो,
    अब गोविंद न आएंगे ।
    छोड़ो मेहंदी भुजा संभालो,
    खुद ही अपना चीर बचा लो।
    द्यूत बिछाए बैठे शकुनि,
    मस्तक सब बिक जाएँगे
    उठो द्रोपदी वस्त्र सम्भालो,
    अब गोविंद न आएंगे ।

    कब तक आस लगाओगी तुम,
    बिक़े हुए अखबारों से।
    कैसी रक्षा मांग रही हो,
    दु:शासन दरबारों से।
    स्वयं जो लज्जाहीन पड़े हैं,
    वे क्या लाज बचाएंगे।
    उठो द्रोपदी वस्त्र सम्भालो,
    अब गोविंद न आएंगे ।

    कल तक केवल अंधा राजा,
    अब गूंगा-बहरा भी है।
    होंठ सिल दिए हैं जनता के,
    कानों पर पहरा भी है।
    तुम्हीं कहो ये अश्रु तुम्हारे,
    किसको क्या समझाएंगे?
    उठो द्रोपदी वस्त्र सम्भालो,
    अब गोविन्द न आयेंगे।