• gatisheel_sadhak_bihari 6w

    विरह

    वो गुजरी यादें ही जननी है अस्तित्व का
    पहचान बनाये है रखता व्यक्तित्व का
    असहज कर देता....
    जब एहसास होता....
    कभी पाए अपनत्व का
    और अब में विरह रूपी शाश्वत सत्य का
    स्वर कुंठित हो जीता,
    जब उपहास ए दूरी बढ़ाता दायरा गम के घनत्व का
    नशा है होता उन रातों में
    जब ख्यालात सो रहे होते,
    और भड़कता उफान जज़्बात का,
    आंधियां है चलती सीने में...चीत्कार कर,
    तब सुलगता हमारा ज़हन ...
    और ढूंढता है पहरा बिछुड़े यार का
    सानिध्य बस इकलौता 'मैं' बचा रह जाता पास
    जब धूमिल हो जाती आस अनबुझी प्यास का,
    और फीकी दिखती पास की सारी तस्वीर मायावी संसार का
    यह नशा तब डरता भी नहीं,नाश हो जाने से
    क्योंकि उस वक्त न जाने कितनी बार अस्तित्व मरता है मानव जात का
    ये तन्हां रातें, वो गुजरी यादें,
    बस एहसास दिलाता हम हैं भूल और भ्रम रूपी एक दूल्हा
    कभी पाये उन खुशियों के बारात का
    ©gatisheel_sadhak_bihari