• keertiameta 14w

    मैं और तुम

    मैं और तुम
    एक डोर के हिस्से से,
    कभी तो रहते साथ,
    कभी गांठों में उलझते से...

    मैं और तुम
    कुछ-कुछ उस कविता से,
    कहीं तो पूरे छंदबद्ध,
    कहीं केवल मुक्तक से...

    मैं और तुम
    आसमान के बादल से,
    कभी तो बरसे,
    कभी हवा से गुज़रते से...

    मैं और तुम
    सागर के उस पानी से,
    अनंत सा छोर तो है,
    फिर भी अबूझी प्यास से...


    ©keertiameta