• kingofsoul 14w

    हम भी जीना..

    पल पल तड़पन बढ़ती जाए,
    टिकी उम्मीदें साँसों पर।
    हम भी जीना सीख चुकें हैं,
    अब तो झूठे विश्वासों पर।

    हम तो गैरों की खातिर भी,
    जख्म सहकर मौन रहे हैं।
    आज वे ही हमसे पूछ रहे हैं,
    आप हमारे कौन रहे हैं।
    भूल चुकें हैं वादे सच्चे,
    रिझ रहे झूठे झांसों पर...
    हम भी जीना सीख चुकें हैं,
    अब तो झूठे विश्वासों पर।

    लौट चुकीं हैं दर से अपने,
    खुशियों की कई नई सौगातें।
    टूट चुकें हैं कोमल सपने,
    रो रहीं हरदम तम रातें।
    मौन पड़े हैं शाश्वत तन भी,
    जग रहा भरोसा लाशों पर...
    हम भी जीना सीख चुकें हैं,
    अब तो झूठे विश्वासों पर।

    V@ibhav saraswat