• arvinddeepak 6w

    प्रकृति

    निःस्वार्थ समर्पित करती सबकुछ, सोचें न कभी सूद-ख़सार।
    जीवों को यह चाहिए, प्रकृति का करें विनीत आभार।।

    धूप से है विकल उठा मन, छाव का अब पता नहीं।
    फल-फूल के आतूर है सब, वृक्ष लगाने आता नहीं।।

    सालों से सींचा है सभ्यता, प्यास बुझाती है नदी।
    तुच्छ स्वार्थ के ख़ातिर बशर, प्रदूषित करते है नदी।।

    वायु की महत्ता को बिसर नर, करता रोज दूषित हवा।
    श्वास रोग से पीड़ित हो तब, रामबाण सम खोजें दवा।।

    जंगल, जमीं, निर्मल हवा, निःशुल्क दिया प्रकृति ने।
    संरक्षा, सुरक्षा, सुनिश्चित कर इसकी, उम्मीद लगायी प्रकृति ने।।
    ©arvinddeepak