• dr_pradeep_sehgal 5w

    ￰अनकही

    पगडंडियां ये ढ़ेर सारी जीवन की ,
    ये टेढ़े मेढे रास्ते...
    ये भूलभुलैयाँ ...
    कहाँ ले जाएंगी ?
    खरोंचें ये ढ़ेर सारी जीवन की...
    मिली हैं जो...
    रिश्तों में ,
    जो खून के रिश्ते हैं...
    या करीब के रिश्ते हैं...
    कहाँ ले जाएँगी ?
    प्यास ये ढ़ेर सारी जीवन की...
    दी है जो अपनों ने...
    दरिया दिखा कर मरु में ,
    ये तृष्णा...
    कहाँ ले जाएगी ?
    छुपा पाऊंगा क्या?
    ये खरोंचें...
    बुझा पाउँगा क्या ?
    ये प्यास...
    लाँघ पाउँगा क्या ?
    ये पगडंडिअां...
    जो शायद
    मुझे ही - मुझसे बहुत दूर...
    मेरी मंजिल से बहुत दूर....
    अनजानी दिशाओं की ओर...
    अनचाही फ़िज़ाओं की ओर..
    और भी...
    न जाने कहाँ...
    कहाँ ले जाएगी..!!
    ©dr_pradeep_sehgal