• manojkumarmanju 12w

    चिंतन कर ले आज मनुज, किस ओर को जाना है
    भेदभाव की किस्ती में, एक छेद पुराना है
    वर्षों बीती इस नफ़रत की, आग में जलते तो
    अपना ही घर और बचा है, आज झुलसने को
    कब तक तेरे मेरे का ये, शोर मचाना है
    चिंतन कर ले आज मनुज, किस ओर को जाना है
    आज चिताएं जली हुई हैं, हिन्द सभ्यता की
    ओछेपन में होड़ लगी है, आगे जाने की
    बेशर्मी के पानी को क्यों, और बहाना है
    चिंतन कर ले आज मनुज, किस ओर को जाना है
    अन्धकार में डूब चुके हैं, यौवन क्या बचपन
    भूखे हाथों नोंच रहे हैं, बस नारी का तन
    रिश्तों के धागों को खींचे, आज जमाना है
    चिंतन कर ले आज मनुज, किस ओर को जाना है
    कर्तव्यों को ताक रखे, बस लालच में डूबे
    रत्ती रत्ती काट रहे, माँ भारति के टुकड़े
    हिन्दुस्तानी मस्तक कितना, और झुकाना है
    चिंतन कर ले आज मनुज, किस ओर को जाना है
    संस्कृतियों के टुकड़े कर, क्या बचा रहा कोई
    राह पतन की शेष और, सब राहें हैं खोई
    बड़ा कठिन इन रस्तों से, अब लौट के जाना है
    चिंतन कर ले आज मनुज, किस ओर को जाना है
    ©manojkumarmanju