• arun_kumar_keshari 6w

    चुपचाप
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    चुपचाप
    पत्थरों को तोड़ती हूँ ,
    उरोजों से चिपके
    अबोध के लिए ,,,,,!

    सुख न जायें दूध
    चिपक न जाये अतड़ियाॅ ,
    पेट से ,,,,
    इसलिए धूप की चादर ओढ़े ,
    राजपथ पर ,,,,
    संसदीय इतिहास के
    इकहत्तरहवें पन्ने को फाड़ती हूँ ।

    रोती नहीं,
    हथौड़ों से खेलती हुई ,,,,
    सिर्फ हँसती हूँ ।

    प्राकृतिक संसाधनों पर
    कैसे ,,,,?
    सिर्फ तेरा अधिकार ,
    लोकतंत्र के आलम्बरदारों से
    पूछती हूँ ।

    संविधान किसके लिए ?
    ना बाबा ना ,,,,
    पत्थर तो टूटते हैं,
    किन्तु
    पत्थर दिल इंसान तो -
    मंदिरों से निकलकर सीधे
    संसद के गलियारे में बैठते हैं ।
    मेरे पेट की भूख से
    वही तो खेलते हैं !

    चुपचाप
    पत्थरों को तोड़ती हूँ ,
    उरोजों से चिपके
    अबोध के लिए ,,,,!!

    @अरूण कुमार केशरी

    ©arun_kumar_keshari