• mahish_s9h 15w

    रोती रही अक़्सर वो
    रखकर तकिये सिरहाने को
    ख़ामोश रही वो हँसते हँसते
    सबके दिल बहलाने को

    छोड़कर जा रही थी
    जन्मी घर की दहलीज को
    कौन बताये दर्द इसका
    जब ठेस लगे दिल के सीज को

    अब तक जो बेरंग ,मनमौजी थी
    सुनती नही थी किसी के कहने को
    बंधने जा रही थी वो किसी की डोर में
    पहनने जा रही थी सिन्दूर , सूत्र जैसे गहने को।


    ©mahish_s9h