• ankitripathi 16w

    वो बे नज़ीर और बड़ी ज़हीन लगती है
    जब होती है ख़फा तो और भी हसीन लगती है

    मेरी फ़रमाइश पे चली आती है दोपहर को
    कहाँ उसके तलवों को ये तपती ज़मीन लगती है

    जर्रे जर्रे में महसूस होती है उसकी ही रवानी
    कमसिन सी बात भी उसकी महीन लगती है

    ये गर्माहट भरा अबके जो महीना गुज़र रहा
    वो मुझपे बस मुकम्मल सी नसीम लगती है

    छिपाती है निगाहों को इस क़दर ज़माने से
    हाँ ग़ैरों के लिए वो जानेमन पर्दानशीन लगती है

    अंकिता