• sujata_writes 15w

    शहर/बारिश/तुम

    पता है? आजकल इस शहर में हर शाम बारिश हो रही है,सड़क पर चलती गाड़ियां,सड़क के किनारे पर खड़ी रेडलाइट बारिश की बूंदों के स्पर्श से और भी खूबसूरत लगने लगे हैं।छत का हर एक कोना भींगा-भींगा रहता है,कपड़े सूखने से पहले हीं भींग जाते हैं,मोर की पंखें बारिश में और सुंदर लगने लगी है।पार्क में बैठे एक जोड़ी शरीर अब अलग अलग नहीं दिखते,वो एक दूसरे की आलिंगन में यूँ सिमटे रहते है जैसे आसमान में बादल।बादल का गर्ज़न प्रेमियों के लिए उपहार सरीखे होता है,वह जब भी गरजता है एक जोड़ी आँखे समुद्र से ज़्यादा गहरी होती जाती है,जिसमें सीपियों को तालाश पाना कठिन होता जाता है।मक्के के दानों को,फूल की टूटी पंखुरियों को और प्रेमी की नज़रों को समेटती हुई वह बेधड़क हो ज़मीन पर गिर पड़ी,प्रेमी ने इतने सलीके से हाथ थामा था,कि मेरी आँखें अब तलक उस दृश्य में अटकी हुई है।उस दिन मुझे तुमसे ज़्यादा वो हथेलियाँ याद आयी,जो सड़क पार करते समय तुमने थाम ली थी।काश! तुम यहाँ होते....तुम इस शहर में होते तो यह शहर,शहर नहीं रह जाता बल्कि तुम शहर हो जाते जो तमाम ग़ुस्से, झिझक,नाराज़गी को अपने अंदर समेट लेते और इस झनक से मैं मुक्त हो जाती।तुम्हें याद है मैं क्यों बारिश का इतना जिक्र किये जा रही हूँ? जब हम दूसरी बार मिले थे और सर्द के कंपकपाते मौसम में बारिश की बूंदे ज़मीन की ओट में छिपने लगी थी,और तुम किसी बहाने से मुझमें। दूर छिपे किसी कोने में प्रेमियों को देख तुम नाराज़ हो जाते थे कि तुम ऐसा क्यों नहीं करती?और मैं इतना सरमाती थी कि मेरी आँखें तुम्हारे ललाट तक भी नहीं पहुँच पाती थी।'घनानंद' 'सुजान' के अँगने तथा यक्ष यक्षिणी के पास जिस भी बारिश को भेजना चाहते थे,मैं उसे तुम्हारे पास नहीं भेजना चाहती,बारिश की असली ख़ुशी तो तभी होगी,जब बूंदे बरसे तो सिर्फ इस शहर में हीं नहीं हमारी आँखों को भिंगोते रहे,कि जब भी यह बरसे मैं या तुम उतनी हीं बार बूंदों को चूमते हुए मिलने को तरसे।
    ©sujata_writes