• smilesharma 33w

    कसम से...

    बड़े दिनों से मुँह पर चढ़ा था- "कसम से!" आज फ़िर जब बोल दिया बातों बातों में ही, तो सोचने लगी-"अरे, शर्मा जी! ये तकियाकलाम कहाँ से आया? और ढल गया आपकी बातों में!"

    फ़िर कुछ याद आया, एक धुंधली थी याद थी। बहुत तेज़ तेज़ बोलती थी वो और मैं बड़े ध्यान से सुनती, कि उसके शब्दों की रफ़्तार मेरी बात मुझे ही भुला न दे।
    सुनने के लिए सुनता ही कौन है, एक जज़्बा रहता है अपना ज्ञान सुनाने वाले पर उड़ेल देने का। आख़िर हम ठहरे विद्वान, हमें सुनाया जा रहा है क्योंकि हमारे पास तो भण्डार है युक्तियों का, अच्छे सुझावों का। ख़ैर... ये सब बचपने के किस्से हैं फ़िर कभी कुरेदेंगे फ़ुरसत से, कि क्या थे और अब क्या हो गए हैं।

    मैंने फ़ोन हाथ में लिया और खोजने लगी एक नंबर, और कर दिया कॉल कोमल को, रात के 12 बजे । देखा तो कॉल उसके पुराने नंबर पर मिल गयी थी। "कसम से यार! रात के 12 बजे हैं और मैं कॉल कर रही थी पुराने नंबर पर, जो अब न जाने किसका हो गया था। हद है!" बड़ी यादें जुड़ीं हैं उसके उस नंबर से, बार बार बिना बात बस मिला देती थी वो नंबर मैं, बिना सोचे की क्या सोचेगी वो मेरे बारे में। सिर्फ इसलिए कि बात करनी होती थी मुझे, कुछ भी; क्या ये वजह काफ़ी नहीं।

    फ़िर सही नंबर डायल किया, खुश कर दिया उसे और खुद को भी। बहुत टाइम बाद बात हो रही थी और बहुत देर तक होती चली गयी। उसने कहा की मैं और मेरे साथ बिताया समय ख़ास है उसके लिए। और हाँ ! "कसम से" वही बोला करती थी।

    आज एहसास हुआ कि हम अकेले नहीं हैं दुनिया में और न ही हो सकते हैँ क्योंकि हममें अक्स होता है उन सब लोगों का जो मिल जाते हैं जीवन के गलियारों में, कुछ आदतें ले जाते हैं, कुछ दे जाते हैं।
    कुछ किस्से याद रह जाते हैं, उभर आते हैं वे स्मृति में किसी नई आदत और तकियाकलाम के साथ।

    ©smilesharma