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    बेवजह नहीं

    उनकी बचपन की नासमझी और डर की ख़ामोशी में न जाने कितने दरिंदो के गुनाह छिप जाते हैं,
    न जाने कितने स्नेहिल रिश्तों की डोर से बंधे प्रियजनो की हवस भरी नज़रों की हकीकत छिप जाते हैं,
    बालपन की मासूमियत में ना जाने कितने ही फ़रिश्तो की हैवानियत छिप जाते हैं,
    युहीं नही वो पथ्थर दिल नज़र आने वाली लड़कियां दर्द से
    खुद की हिफाज़त करने के लिए मगरूर बन जाया करती हैं|
    बेवजह नहीं फूल पथ्थर के हो जाया करते हैं|
    ©jagriti_singh_rajput_