• kishore_nagpal 14w

    इस जीवन में जब हम आते है, तो अपने प्रारब्ध लेकर आते है । और उसके अनुसार ही हमें हमारे जीवन की परिस्थतियाँ मिलती है । इस जीवन में जो प्रभु मुखी नही होते है वे जीवन में सांसारिक मोह माया, और अपने विकारो के वश मे पडकर लगातार पाप कर्म करते रहते है, और दु:ख भोगते है ।

    जो जन प्रभु मुखी हो जाते है, वे गुरु चरणो में, गुरु आज्ञाओ में रहते हुये, अधिक से अधिक जप करते हुये, दिन भर अपने को प्रभुमय भाव में रखते हुये, अपने नित्य के आचरण पर सावधानी से निगाह रखते हये, अपने विकारो पर नियंत्रण का प्रयास करते हुये, और प्रभु के प्यारो का संग करते हुये अपने आप को प्रभु चरणो में समर्पित करने का प्रयास करते है ।

    प्रभु स्वयं कहते है, जो अपने आप को मुझे समर्पित कर देता है, मैं उसके कर्म बंध भी काटकर रख देता हूँ, उसके प्रारब्ध भी काटकर रख देता
    हूँ । ऐसे साधको को कष्ट सहन नही करना पडता है ।

    ऐसे साधक जीवन में जो भी परिस्थति आये उसे प्रभु इच्छा मानकर खुशी से स्वीकार करते है, और प्रभु मुखी रहकर प्रभु के नाम जप, सिमरण, और ध्यान में लीन रहते है ।

    जब साधक जीवन के हर हालात को प्रभु इच्छा मानकर खुशी से स्वीकार करता और उन हालात में भी साधना में लीन रहता है, प्रभु उसके ग्रह मान बदल देते है और उसका योग क्षेम स्वयं सहन करते है ।
    ©kishore_nagpal