• shayarcastic_soul 6w

    मेरे अपनों का मेरी मुश्किल से कोई वास्ता कहाँ रहा?
    समंदर की गहराई का साहिल से कोई वास्ता कहाँ रहा?

    टूटे दिल की बंजर ज़मीं पर मुशायरे सजते है यहाँ ।
    मुकम्मल इश्क़ का किसी महफ़िल से कोई वास्ता कहाँ रहा?

    कुछ वो मुझे भटकाता रहा, कुछ मैं यूँही भटकता रहा ।
    मुहाजिर ए इश्क़ का किसी मंज़िल से कोई वास्ता कहाँ रहा?

    काँच था तो अक्सर कई दिल तोड़ जाते थे मुझे।
    अब पत्थर बना तो मेरा किसी दिल से कोई वास्ता कहाँ रहा?