• amanshrivastava 22w

    निंदा सभी लोग कर रहे हैं और कड़ी निंदा होनी भी चाहिए। किन्तु साथ ही ज़रूरत है समस्या का समाधान ढूंढने की। कानून से कई ज़्यादा कारगर है सोच और व्यवहार में बदलाव। ये बदलाव हमे अपने घरों से शुरू करना होगा। बेआबरू होती बेटीयाँ तभी सुरक्षित होंगी जब बेटों को उनके सम्मान व सुरक्षा का महत्त्व समझाया जाये। इसी कड़ी में मेरी ये रचना।
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    सोच से सुरक्षा तक

    निर्भया के आरोपी फांसी चढ़े भी नहीं
    आसिफा को नई निर्भया का दर्जा मिल गया
    उसकी माँ के आंसू सूखे भी नहीं
    और वादी में एक और घर उजड़ गया।
    प्रदर्शन - विरोध पहले भी हुए
    राजनीतिकरण आज भी हो रहा है,
    कानून बनाने के ढकोसले तब भी थे
    कानून का रखवाला ही हैवान हो रहा है।
    धर्म जाति संप्रदाय इंसानियत सिखाते हैं
    कुछ एक दरिंदे मिल समाज को शर्मिंदा कर जाते हैं।
    दिल्ली से कथुआ और अब उन्नाव
    इन छह सालों में कुछ हुआ है तो सिर्फ चुनाव।
    जन कल्याण एवं सुरक्षा की शपथ लेने वाले
    आज स्वयं ही दे रहे सुरक्षा को गहरा घाव।
    कौन हैं ये लोग, कहाँ से आते हैं!?
    इस तरह के सवाल हम अक्सर पूछ जाते हैं।
    गौर करके कभी देखिए अपने घर-पड़ोस में
    हम आपके बीच से ही निकलते हैं ये सत्ता पाने के जोश में।
    कानून प्रंडाली पर भी कब तक आरोप मंड़ेंगे
    ये घर के भेदी लंका ढहाने का काम कब तक करेंगे।
    जो बदलाव लाने का इच्छुक वाकई है ये समाज
    सबसे पहले बदलने होंगे पुरुष प्रधान रीति रिवाज़।
    कोख से ही शुरू होने वाले पक्षपात मिटाने होंगे
    लड़कियों की आज़ादी पर लगे ऐतराज़ हटाने होंगे।
    घर तक सीमित रख गृहस्ती का बोझ उस पर न रखें,
    अपनी ही औलाद समझें धन पराया न कहें।
    हर अभिभावक इसे दायित्व समझ चलन में लेकर आए,
    'लड़का लड़की एक समान' नारे को अमल में लेकर आए।
    गाँव, शहर, गली, मोहल्ले, हर घर तक ये सीख जाए
    महिलाओं की स्वतंत्रता का सम्मान हर लड़के को करना आए।
    सबसे ज़रूरी इस पहल में भूमिका महिलाएँ निभाएँ
    घर परिवार की ज़िम्मेदारियों में सम्मान स्वयं का न गंवाएं।
    तिरस्कार जो भी करे पुरज़ोर विरोध उसका करें
    घर के अपने ही क्यों न हों झिझक ज़रा भी न रखें।
    अपनी ही माँ को जब लड़ते हक़ के लिए देखेंगे
    किसी और महिला की आबरू संग खिलवाड़ की न सोचेंगे।
    जब घर में देखेंगे महिला संग होता समानता का व्यवहार
    कभी न समझेंगे नारी का दमन करना अपना अधिकार।
    हर बेटी को सीख ये अपनी माँ से मिले
    आश्रित होने का किसी पर विचार मन में न पले।
    ज़हन में हर बेटी के ये बात घर जाए
    कमज़ोर उसे कहने वालों के छलावे में न आए।
    जब बात इज़्ज़त पर आए, स्वयं बन दुर्गा लड़ जाए।
    ये असमाजिक तत्व समाज को कलंकित कर सकते हैं कमज़ोर नहीं
    जो एक जुट सब करें विरोध चलेगा इनका न ज़ोर कोई।

    ©amanshrivastava