• gatisheel_sadhak_bihari 14w

    हुनर

    तलबगार अब भी हैं ढेरों इस हुनर के........जिन्हें सच पे होता फक्र है,
    वफादार वो कहाँ..............जिनको अपने चेहरे की ही महज कद्र है!

    अब मिल लेते हैं हम भी............................लिए अदब बड़े शान से,
    तभी उनकी और मेरी मुलाकातों में,अब नहीं शिकायतों की वैसी जिक्र है!

    कुछ खास नहीं समझाना उन्हें..........जिन्हें भीड़ की होती है दरकार,
    यहाँ प्यास बस एक दौड़..............क्योंकि मेरे पे रब जी का शुक्र है!

    बेहद ही साफगोई अँदाज में..............बयां होते हैं किस्से स्वप्रचार में,
    पर इल्म नहीं होता किसी को के इसमें...............झूठ बेहद मुखर है!

    इतिहास गवाह है के चंद दिनों में ही.....एक अलग पहचान बनाई थी,
    अब ऐसा लग रहा कि मेरा शमशान बेहद करीब.......अब में प्रखर है!

    जो लोग थे मेरे बेहद अपने.................बेवक़्त ही छुप गए, शहर में,
    क्योंकि स्टेटस के लिये उन्हें मंजूर,लाख कोई खाये पीठ पीछे खंजर है!

    "साधक" ये जो किस्सा है समता का....वो दिखता है अब में बस भ्रम!
    क्योंकि चरन उनके जमीं पे नहीं, आसमान में छिपा जो उनका शहर है!


    ©gatisheel_sadhak_bihari