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    ग़ुरूर के हत्थे

    मेरी तरह कईं आशिक़ हैं तेरे हुस्न के
    आख़िर कबतक हम सबको लटकाओगी
    अग़र ऐसे ही तादाद बढ़ती रही मजनुओं की
    किसी दिन अपने ही ग़ुरूर के हत्थे चढ़ जाओगी

    © रवि