• kundan123 20w

    लौट आओ न माँ

    शाम को घर में पसरे सन्नाटे को समेटने फिर से,
    लौट आओ न माँ।
    मेरे इन बिखरे कपड़ों को उठा के मुझे डांटने फिर से,
    लौट आओ न माँ।
    मैं थक गई हूँ मुझे अपनी गोद में सुलाने फिर से,
    लौट आओ न माँ
    मैं लड़ी नही हूँ उस दिन से, मुझसे लड़ने फिर से,
    लौट आओ न माँ।
    मेरे बिखरे सपनों को मोतियों में पिरोने फिर से,
    लौट आओ न माँ।
    दूर तक निहारती अधमरी आंखों में बसने फिर से,
    लौट आओ न माँ।
    ©kundan123