73mishrasanju

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Reposts
  • 73mishrasanju 12w

    मेरी ज़िंदगी है , दर्द कि तरह,
    अश्कों से लिखी इबारत कि तरह।

    सुनता हूँ अपने दिल की , धड़कन कभी-कभी,
    जैसे मातमी शहनाई कि तरह,
    यादें सताती हैं, आहट कि तरह,
    उन कदमों कि, जिनके लिये मैं कभी,
    बिखरा था बनके ओस कि तरह,
    सिमटा हूँ चिता की राख कि तरह।

    मेरी ज़िंदगी है , दर्द कि तरह.....

    खो सा गया हूँ अपने ख्वाबों में इस तरह,
    जैसे धुंध में , परछाई कि तरह,
    तपिश , सताती है चाहत कि तरह
    उस दामन कि जिसके लिये मैं कभी,
    बिखरा था, बनके गुलाल कि तरह,
    सिमटा हूँ चिता की राख कि तरह ।
    मेरी ज़िंदगी है दर्द कि तरह,
    अश्कों से लिखी इबारत कि तरह।
    तुम बिन ज़िंदगी है ..........

    ©73mishrasanju

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  • 73mishrasanju 14w

    प्रेम की अनुभूति और अभिव्यक्ति में अंतर क्यूं है।
    नम हुई आँख ज़रा, फिर ये समंदर क्यूं है |

    ©73mishrasanju

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  • 73mishrasanju 25w

    उलझन

    उलझे विचार धांगो से
    सुलझते ही नहीं
    लाखों बार नहीं
    बार बार कई बार कोशिश की
    पर नहीं सुलझते
    सोचता था एक सिरा जो आ जाए हाथ तो हौले हौले कितना भी लम्बा वक्त लगे
    करीने से एकसार कर गोले बना दूंगा उलझे विचारों के
    ताकि तुम्हे न हो परेशानी एक ख्याल के दुसरे ख्याल में उलझ जाने की
    तुम्हारा हर ख्याल अलहदा हो
    हर विचार सुलझा हो तो
    सहज सरल हो जाए जीवन
    पर कितना सर मारा कितनी बार आँखों को आंसुओं से धोकर साफ़ किया
    अब तो याद भी नहीं सच्ची
    समझ गया तजुर्बों से उम्र के बढ़ते अंकों से और जीवन के कम होते वर्षो से
    उलझे विचार रेशमी धागों से है जो सिरे मिल जाने पर भी नहीं सुलझते कभी
    रेशमी धागों में पड़ी गांठे कहाँ खुलती है किसी से
    उन्हें तोड़ ही देना पड़ता है
    और टूटा हुआ कुछ भी हो व्यर्थ है
    चाहे रिश्ते हों या धागे
    विचार हो या ह्रदय
    सब अर्थहीन
    ©73 mishrasanju

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  • 73mishrasanju 27w

    मैं कोई सूफी नहीं तुम भी पैग़मबर नहीं
    पाप क्या है पुन्य क्या है आप ही समझाईये .
    वक्त कम है जो बचे हों वो गिले कर लीजिये
    आप की मर्जी है फिर जाईये न जाईये .
    भूल कर कल के दुखों को आज को अपनाइये
    रोने को दुनियां पड़ी है ,आप मुस्कराइये

    ©73mishrasanju

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  • 73mishrasanju 40w

    कब ये देह त्यागू, शिशु सा मुस्कुराऊँ में.....
    इस चक्रव्यूह से पार हो जाऊँ में......
    असीमित स्वप्न जो कल तलक,आँखों में पले थे.....
    आज हो विकल आहों से चले,.....
    में निशब्द,मौन,निरर्थक प्रश्नों में उलझा रहा,...
    सामने मेरे ही,मेरा हल निकलता रहा,...
    .अब ये हाल है.....साँसे भी भारी, मृत्यु ये तेरी आभारी,
    ले चल कहीं दूर,जहाँ पुनर्जन्म हो मेरा,
    इस रात के बाद हो नूतन सवेरा,......
    कब ये देह त्यागू,शिशु सा मुस्कुराऊँ में......
    इस चक्रव्यूह से पार हो जाऊँ में......
    इस चक्रव्यूह से पार हो जाऊँ में......

    ©73mishrasanju


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  • 73mishrasanju 45w

    पेशानी की सिलवटों पे मेरी गौर ना करो,
    ग़ुम हूँ ख्यालों में तुम्हारे यूँ शोर ना करो।

    ©73mishrasanju

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  • 73mishrasanju 46w

    रचनाकार: दुष्यंत कुमार


    कहाँ तो तय था चराग़ाँ हर एक घर के लिये
    कहाँ चराग़ मयस्सर नहीं शहर के लिये

    यहाँ दरख़्तों के साये में धूप लगती है
    चलो यहाँ से चले और उम्र भर के लिये

    न हो क़मीज़ तो घुटनों से पेट ढक लेंगे
    ये लोग कितने मुनासिब हैं इस सफ़र के लिये

    ख़ुदा नहीं न सही आदमी का ख़्वाब सही
    कोई हसीन नज़ारा तो है नज़र के लिये

    वो मुतमइन हैं कि पत्थर पिघल नहीं सकता
    मैं बेक़रार हूँ आवाज़ में असर के लिये

    जियें तो अपने बग़ीचे में गुलमोहर के तले
    मरें तो ग़ैर की गलियों में गुलमोहर के लिये.

    मयस्सर=उपलब्ध

    मुतमईन=संतुष्ट

    मुनासिब=ठीक
    प्रस्तुति :- संजय मिश्रा

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  • 73mishrasanju 48w

    रिश्ते


    महके
    मन मेरा,
    मोगरे से रिश्ते,
    मेरे अपने मेरे पास,
    मत महक मन खोखले रिश्ते

    ©73mishrasanju

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  • 73mishrasanju 49w

    हाँ ! अभी शेष है
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    शेष है ह्रदय में स्पंदन अभी ।
    शेष है सहमा हुआ सा निश्छल प्रेम ।
    शेष है डरी हुई संवेदना
    सुनता है मन उजड़े ह्रदय की वेदना ।
    शेष है सुन्न होती चेतना ।
    शेष है भंगुर होता विश्वास ।
    शेष हैं जड़ें , सूखते वृक्ष की ।
    कान बहरा चुके आश्वासनो से अब।
    नही सुनपाते कान चीखें ,
    भीड़ में मारे गए मासूमों की,
    बिलखती विधवा और बच्चों की।
    नही सुनपाते कान ,
    आवाजें टूटती चूड़ियों की ।
    नही सुनपाते कान ,
    चीखें ,चीत्कार,
    बलात्कारियों की हवस की शिकार
    अबोध बच्चियों ,अबलाओं की।
    नहीं सुनपाते कान ,
    धर्मांध भीड़ के उत्पाती हल्ले की।

    शेष है आस सुखद परिवर्तन की।
    शेष हैं आशाएं सुखद अनुभूति की ।
    शेष हैं आशाएं बगीचे में बहारों के
    फिर लौटने की।
    शेष हैं आस लुभावने फूलों के फिर खिलने की।

    शेष है अडिग विश्वास
    शेष है अखंड निश्छल प्रेम ।
    शेष है मासूम सी संवेदना ।
    शेष है ह्रदय में स्पंदन अभी ।

    ©73mishrasanju

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  • 73mishrasanju 51w

    चुपके से आई ज़िन्दगी , खता कैसे न हो,
    भड़कते शोले,ठंडी सी तपिश, मोहब्बत कैसे न हो....

    ©73mishrasanju

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