_jiya_

random thoughts mixed with some feelings to create a perfect recipe of words.... instagram:@j_khandelwal_

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  • _jiya_ 2w

    मैं इंतज़ार करूंगी

    मेरी इस हसीं का जो तुम्हें देखकर मेरे लबों को छुपके से सजाती है

    मैं इंतज़ार करूंगी उन आसुओं का जो तुम्हारे जाने पर मेरी पलकें भिगो जाते हैं

    मैं इंतज़ार करूंगी उन पलों का जो मैने तुम्हारे साथ बिताये और जिनमें मैं खुश हूँ

    मैं इंतज़ार करूंगी मई की उन छुट्टियों का जो मुझे तुम्हारे घर ले जाया करती हैं

    मैं इंतज़ार करूंगी हर उस चीज़ का जो मुझे तुम्हारी याद दिलाया करती हैं

    क्यूँकी फिलहाल मैने तुम्हें दे रखी हैं

    मैं और मेरी चीज़ों में तुम्हारा;
    मैं इंतज़ार करूंगी

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    मैं इंतज़ार करूंगी
    (CAPTION..)
    ©_jiya_

  • _jiya_ 5w

    बैठे हैं इंतज़ार में किसी दीदार-ए-अक्स के,
    अपनी परछाई अब सिर्फ़ परछाई नही लगती
    ©_jiya_

  • _jiya_ 6w

    मुझमें कितनी मैं?
    ये सवाल मैं खुद से कई बार पूछ चुकी हूँ,
    पर जवाब अभी तक नही मिला।
    मुझमें कितनी मैं हूँ ये भी मैं नही जानती,
    उन हज़ारों दुसरे सवालों की तरह जिनके जवाब मुझे रटे रहने चहियें।
    मुझे ये किसी ने नही बताया,
    ठीक उसी तरह जैसे ये नही बताया गया की क्यूँ का कोई जवाब क्यूँ नही होता।
    तीन दिन पहले किसी ने मुझसे एक आसान सवाल पूछा "कुछ बताइये अपने बारे में"
    ये सवाल सुनने में जितना सरल लगता है, मेरे लिए उतना ही कठिन था।
    क्युन्की मैं खुद को तो जानती ही नही।
    मैने हमेशा खुद्को अपनी माँ या अपने पिता की नज़र से देखा है।
    या देखा है तो अपने दोस्तों के नज़रिये से।
    पर मैं हूँ कौन?
    क्या मैं वो लड़की हूँ जो बातें अपनी उम्र से बड़ी और हरकतें अपनी उम्र से छोटी करती हूँ?
    या फिर वो जो एक पल एक हस्ती, खिलखिलाती बच्ची है, और दूसरे पल एक स्नजीदगी से भरी महिला?
    मुझमें आखिर कितनी मैं हूँ?
    और कितनी एक बेटी, एक बहन, एक दोस्त?
    क्या ये सब सवाल सामान्य हैं?
    या मैं कुछ अलग हूँ?
    मैं आखिर हूँ तो हूँ कौन?
    ये सवालों का दलदल मुझे अपने अन्दर खींचता ही जा रहा है, पर शायद मुझे जवाब मिल चुका है।
    "सिर्फ़ आत्मा नश्वर है"
    तो क्या फ़रक पढता है की मुझमें कितनी मैं!
    क्यूँकी असलियत तो सिर्फ़ एक ही है ना,
    की मुझमें कई मैं!

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    मुझमें कितनी मैं?
    (CAPTION...)
    ©_jiya_

  • _jiya_ 6w

    पाकीज़ाह...

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    Basically, I am dreaming a "मुआफ़ कीजियेगा, इत्तेफाकन आपके कम्पार्टमेंट में चला आया था, आपके पाऊँ देखे, बहुत हसीन हैं, इन्हें ज़मीन पर मत उतारियेगा, मैले हो जाएंगे.."
    in this world of "Are you lost babygirl?"
    ©_jiya_

  • _jiya_ 10w

    कभी थोड़ी मायुसी, कभी अत्यंत प्यार,
    कभी पूरी रात बातें, और कभी एक लफ्ज़ भी नहीं,
    कभी वोह मैगी वाला मूड, तो कभी सेक्सी वाला,
    वोह रात के 1:30 बजे वाली फीलिंग भी ना, आजीब है।
    कभी 3 किताबें एक बार में पढ़ जाना, तो कभी एक पन्ने पर ही सो जाना,
    कभी कभी तारों को निहारना, तो कभी चल रहे पंखे को घूरना,
    कभी घर में किसी भूत की तरह टहलना, तो कभी कुम्भकरण की तरह सोना,
    वोह रात के 1:30 बजे वाली फीलिंग भी ना, अजीब है।
    कभी गानों में खो जाना, तो कभी खुद गुलज़ार बन जाना,
    कभी अरिजित को गले लगाना, तो कभी लता दीदी की गोद में सो जाना,
    कभी पुराने किस्से उधेड़ना, तो कभी नई यादों को समेटना,
    वोह रात के 1:30 बजे वाली फीलिंग भी ना, अजीब है।
    कभी इर्र्फान की आंखें, तो कभी शम्मी कपूर का डांस,
    कभी पारो की चिट्ठियों को उलट-पुलट लेना तो कभी फैज़ल का बदला लेना,
    कभी रात भर सुबह का इंतज़ार, तो कभी उसी रात में घुम हो जाने का खयाल,
    वोह रात के 1:30 बजे वाली फीलिंग भी ना, अजीब है।

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    वोह रात के 1:30 बजे वाली फीलिंग

    (CAPTION...)
    ©_jiya_

  • _jiya_ 10w

    मैं कोशिश कर रही हूँ तुम्हें भुलाने की,
    पर इतना आसान नहीं हैं ना।

    मैं कोशिश कर रही हूँ उन लम्हों को मिटाने की,
    पर अब वो आस्माँ नहीं हैं ना।

    मैं कोशिश कर रही हूँ हर रात, हर दिन,
    पर तुम भूल जाने वाले शक़्स नहीं हो ना।

    जब तुम थे तब मैं तुम्हें 'आप' बुलाया करती थी,
    पर; अब तुम नहीं हो ना।

    मैं कोशिश कर रही हूँ, अपनी चाय की आदत छुढ़ाने की,
    पर अब वो बस आदत नहीं है ना।

    मैं जानती हूँ कुछ ज़्यादा ही समय लग रहा है मुझे,
    पर मैं कोशिश कर रही हूँ।

    आज नही तो कल, तुम होगे एक पुराना चैप्टर मेरी कहानी में,
    पर ये कहानी अभी पूरी नही है ना।

    मैं कोशिश कर रही हूँ रात में जल्दी सोने की,
    क्यूँकी अब जागे रहने की कोई वजह नही है ना।

    मैं कोशिश कर रही हूँ उन गानों को अनसुना करने की,
    पर वो गाने अब सिर्फ़ 'गाने' नहीं हैं ना।

    मैं वादा करती हूँ मैं तुम्हें भूल जाऊंगी,
    क्यूँकी अब याद रखने का हक़ मुझे नहीं है ना।

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    मैं कोशिश कर रही हूँ
    (CAPTION...)
    ©_jiya_

  • _jiya_ 12w

    आज सुबह से ही एक अटपटि उलझन में हूँ,
    कभी उसे याद करती हूँ, तो कभी तुम्हें,
    हालांकी वो मेरा अतीत था, और तुम मेरा भविष्य हो,
    और दोनों ही कोसों दूर हैं, पर बिल्कुल पास।
    तुम तो जानते हो उसे, मिल चुके हो उससे पहले,
    मेरी भाषा में, मेरी कविताओं में, मेरे उस बन्द पड़े दिल के दराज़ में।
    तो कैसा है वोह? ठीक? क्या अब भी तुम्हें मेरी पसंद, पसंद है?
    हाँ जानती हूँ की तुम जानते हो मेरे उस 'कल' को,
    जिसे मैं खुद नहीं जानती, या शायद जानना ही नहीं चाहती।
    समझ पा रहे हो ना मेरी उलझन, की ज़िंदगी के ये कैसे मोढ़ पर आकर मेरे कदम ठिठक रहे हैं,
    तुम्हें मैं अपना भविष्य मानती हूँ क्यूँकी एक तुम हो,
    जो जानता है की मेरा अतीत क्या था और तुम फिर भी मुझे चाहते हो, मुझसे ज़्यादा; उससे ज़्यादा,
    और एक मैं हूँ, जो तुम्हें बस ये बताने में लगी हूँ की किस तरह 'कल' भुलाया नहीं जाता!
    की किस तरह, हर बार; हर एक बार आपका एक हिस्सा ना- चाहते हुए भी वहाँ छूट ही जाता है।

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    क्या कभी 'कल' भुलाया जा सकता है?
    (Caption)
    ©_jiya_

  • _jiya_ 12w

    किये होंगे ना वादे तुमने भी किसी से,
    इस तारों भरे आस्माँ के नीचे सोने को,
    पकड़ा होगा ना किसिने हाथ तुम्हारा,
    ज़िंदगी भर साथ चलने को,
    सुनाए होंगे ना तुमने भी उसे अपने तराने,
    कुछ लफ्ज़ उसके अपने होठों पर पढने को,
    तो क्या तुम्हे भी याद हैं वो आँसू,
    जो बहाये थे तुमने अपनी 'खुशी' बयाँ करने को,
    मैं नही जानती तुमने कितने गहरे घाव सहे हैं,
    मैं नही जानती की तुम अब भी सितारों को,
    देखते हो उनसे बस प्यार भर करने को,
    पर मैं ये ज़रूर जानती हूँ की,
    कुछ है तुम में, जो मुझे अपना सा लगता है,
    तो सुनो ना, आज रात मिलोगे उन्हीं तारों के नीचे,
    मुझसे वही वादे करने को,
    कहो; मिलोगे ना?

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    ज़रा सुनो, तुमसे कुछ कहना है
    (Caption...)
    ©_jiya_

  • _jiya_ 15w

    उस पायल की झंकार में,
    उस कजरे की धार में,
    मैं आज भी तुम्हें पाता हूँ।

    उन पुराने गीतों में,
    उन अधूरी कविताओं में,
    मैं आज भी तुम्हें सुनता पाता हूँ।

    वो खाली सी सड़कों पर,
    वो बंजर ज़मीं पर,
    मैं तुम्हें आज भी आता देख पाता हूँ।

    वो बड़े-बड़े नैन तुम्हारे,
    वो लम्बे घुन्गराले बाल,
    वो सब; मैं आज भी महसूस कर पाता हूँ।

    उस खाली पड़े चाय के प्याले में,
    उड़ आधी पढ़ी किताब में,
    मैं तुम्हें आज भी चाय को ठंडा करते देख पाता हूँ।

    वो बिखरा हुआ बिस्तर,
    वो सल से भरे कपड़े,
    आज भी तुम्हारी राह ताकते हैं।

    पर ये सब कल्पानाएं
    फिर जी उठेंगी जो बस एक दफ़ा,
    सिर्फ़ एक दफ़ा तुम मुझे नज़र भर देखलो।

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    कल्पानाएं हैं कुछ
    (Caption)
    ©_jiya_

  • _jiya_ 15w

    Dear Irrfan,
    I never realized how much of an inspiration you were for me, until today. When I heard the heartbreaking news from my father and ran in the bathroom to shed a tear or two.
    I haven't seen much of your cult classics but am fortunate enough to have witnessed some. And as everyone is saying the loss is more personal than we expected it to be. I've loved every part of you; from Shaukat to Champak, to Rana to Yogi and every single character you ever played that I saw.
    To be honest, I have a soft corner in my heart for Yogi cause when I first saw the film I just hoped I would find the Yogendra kumar Devendranath Prajapti urf Viyogi to my Jayshree TK.
    I cannot come to terms with the news still...
    As when the words first struck my ears; my heart deeply hoped that the news was fake... but it isnt.
    You are actually gone.
    But; but... You will always be the actor we needed and the inspiration we craved.
    I just hope you find your peace in the heavenly Adobe and look down at us with the charming smile you always had.

    With all due respect and love,
    A fan

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    Dear Irrfan,

    Caption...
    ©_jiya_