akarshita29

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Studying in BHU Persuing mass communication...

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  • akarshita29 73w

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  • akarshita29 73w

    @hindiwriters@shabdanchal
    @ kavyagram
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    मैं भी उड़ना चाहती हूँ,
    तुम भी वादियों की सैर लगाते हो।
    मैं भी खुलना ,यूँ आगे बढ़ना चाहती हूँ,
    तुम भी समाज की लीकों से आज़ाद होने का ख्वाब देख जाते हो।
    मैं भी खुशियां ओढ़ना चाहती हूँ,
    तुम भी जिंदगी खुलकर जीना चाहते हो।
    मैं भी खुद को खुद का हौसला बनाती हूँ,
    तुम भी खुद को अक्सर खुद से ही आजमाते हो।
    मैं भी खुद की खोज में हूँ,
    तुम भी मेरी फ़िराक में कही दूर निकल जाते हो।
    मैं भी हक़ीक़त को ख़्वाबो के आगे टाल जाती हूँ,
    तुम भी अपने रंधों के सहारे हर ख़्वाब हक़ीक़त में बदल जाते हो।
    जब मैं भी तुम और तुम भी मैं कहलाते हो,
    तो अक्सर बंद पिजड़े को तोड़ तुम मुझे कही दूर छोड़ आज़ाद कर जाते हो।।
    ©akarshita29

  • akarshita29 74w

    जिंदगी में डूब जाना
    इसके हर इक पल में खो जाना
    इसकी हर एक ख़ुशी को महसूस कर
    हर ग़म में भी मुस्कुराना
    बेहतर है
    उसे बार-बार याद कर
    उसे सोच -सोच कर
    बस यूँ ही
    चंद छोटे ,
    कल्पना के लम्हों के ख़ातिर
    गुज़ार देना।।
    ©akarshita29

  • akarshita29 75w

    स्त्री

    बेशक़ ,
    झुकेंगी नज़रें मेरी तुमसे टकराने पर।
    बेशक़ ,
    मेरी हर आहट की पहचान सिर्फ़ तुमसे होगी।
    बेशक़ ,
    मेरी उड़ती जुल्फों पर दिल तुम्हारा मचलेगा।
    बेशक़,
    मेरे झुमकों पर नज़रे टेढ़ी सिर्फ़ तुम करोगे।
    बेशक़,
    मेरी खनकती चूड़ियों की आवाज़ तुम सुन पाओगे।
    बेशक़ ,
    मेरी हर अदा सिर्फ़ तुम्हारे लिए होगी।
    बेशक़ ,
    मैं वो सबकुछ होंगी जो कुछ तुमसे होगा।
    लेक़िन
    जब-जब तुम्हारी नज़रें ,
    तुम्हारी हरकतें
    युँ गुनाहों में तब्दील होंगी।
    जब-जब तुम दरिंदगी पर उतर आओगे।
    और स्त्री मर्यादा की दहलीज़ भूल जाओगे।
    तब इन्ही बेख़ौफ़ नज़रों से तुम्हें खौफ़ दिखाऊंगी।
    इन्हीं खनकती चूड़ियों वाले हाथों से शमशीर उठाऊंगी ।
    अपनी शील मर्यादाओं का दामन छोड़ ।
    तब दिखलाऊँगी तुम्हें अपनी सीमा ,अपनी ताक़त।
    जिसे पार पाना न तुम्हारे बस में था ,न होगा।
    विवश करोगे जब -जब मुझे,
    तब -तब त्यागूँगी मैं शीलता का चोला।
    लूँगी मैं रौद्र स्त्री का अवतार,
    दूँगी तुम्हें तुम्हारे गुनाहों की सज़ा।

    स्त्री हूँ मैं ,
    मेरे आत्मसम्मान से जब -जब खेलोगे।
    तब-तब ,
    अपने प्राणों पर संकट झेलोगे।
    जब- जब खेलोगे,
    मेरी बेबस तकदीर से।
    तब- तब तुम्हारे तक़दीर की ,
    भाग्यविधाता मैं बनूँगी।।
    ©akarshita29

  • akarshita29 75w

    मैं जज़्बात हूँ ,
    प्यार हूँ ,
    अहसास हूँ।
    कोई अकड़ ,
    रुतबा ,
    या ताक़त नहीं।
    जो जता जाऊँ ,
    सुना जाऊँ।
    हर छोटी- छोटी बातों
    पर दिखा जाऊँ।।
    ©akarshita29

  • akarshita29 76w

    कुछ न कुछ ,
    करते तो सभी है।
    इस असीम सम्भावनाओं ,
    से भरी दुनिया में।
    लेक़िन वो कुछ ही होते हैं,
    जो करते हैं।
    कुछ कर जाने के लिए।
    ख़ुद को पाने के लिए।
    ख़ुद का क्यों तराशने के लिए।
    ख़ुद का वजूद ,अपने दिल की धड़कन
    पहचानने के लिए।
    खुद का जुनून, ख़ुद की जिद
    पाने के लिए।
    अक्सर ख़ुद में युँ डूब जाने के लिए।
    अपने दिल की आवाज़ को ,
    अपने रंधों के सहारे ,
    पूरा कर जाने के लिए।।
    ©akarshita29

  • akarshita29 76w

    काश कोई इतना
    बता जाता।
    इस ज़िन्दगी को
    जीने का तरीका
    ही सिखा जाता।।
    ©akarshita29

  • akarshita29 76w

    इन दुश्वारियों से ही ,
    तो सीखा है जीना।
    आसानियाँ होती
    तो जिंदगी क्या खाक़ समझ आती।।
    ©akarshita29

  • akarshita29 76w

    इन अंगारों से ,शोलों को भड़कने दोl
    खुद को तुम ,खुद की क़ैद से निकलने दो।
    कबतक यूँ बेज़ान होकर जीते जाओगे,
    कभी तो खुद की क़ाबिलियत से खुद को निखरने दो।
    तोड़ दो वो जंजीरें ,जो बांधती हो तुमको।
    छोड़ दो वो शिकायतें ,जो कभी गलतियाँ बन जातीं हों।
    किसी और के गुनाहों की सज़ा,
    कब तक दोगे यूँ सबको एक सा समझ कर।
    क्यों,
    सबकी गलतियों पर , बस तुम्हारे वादे टूटें।
    सबकी खुशियों पर , क्यों तुम्हारे ग़म बरसें।
    बहुत हुआ यूँ अतीत का लेखा -झोखा।
    कल को छोड़ ,न आगे की होड़,
    अपना आज बनाकर देखो।
    अच्छा लगेगा, सबकुछ सच्चा लगेगा।
    फिर शिकायतों की जगह ,दुवाएँ बरसेंगी।
    पछतावे की जगह सुकून होगा।
    और नफरत की जगह
    जहन में प्यार का शैलाब उमड़ेगा।।
    ©akarshita29

  • akarshita29 76w

    ज़नाब,
    बेबाक़ थी मैं अपने लफ़्ज़ों में।
    अब तुम्हें सुनने में ,
    दुश्वारियाँ ।
    समझने में,
    नाक़ामियाँ।
    हासिल हुईं
    तो इसमें खता क्या थी मेरी।।
    ©akarshita29