aparna_shambhawi

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सनेहु जानत रावरो ��

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  • aparna_shambhawi 14w

    #paki #mirakee
    @gumnam_shayarr @panchdoot @adhuri_ankahi_baatein @prakhar_sony @rudraaksha

    तुम्हारी छाया चित्र को
    इतना सरल तो
    नहीं होना था,
    एक सिद्धि को
    कागज़ के टुकड़े में
    कैसे समेटा जा सकता है!

    तुम वो ऊर्जा हो
    जिसे प्राप्त कर पाना
    ईश्वर के लिए भी सहज नहीं।
    तुम कोई प्रेम पुष्प नहीं
    जो अर्पित की जा सको
    किसी प्रेम के देवता पर,
    तुम तो मंदिर का
    अनवरत जलता लोबान हो
    जिसका स्पर्श वर्जित है
    कई पीढ़ियों से
    परंतु जिसके
    हर-श्रृंगार सज्जित
    केशों की अलौकिक सुगंध से
    व्याकुल हो उठती
    आ रही हैं
    मूर्तियाँ युगों से!

    तुम्हारे अलौकिक
    देह को
    नहीं बाँध सकता
    दोष युक्त रेशमी वस्त्र ,
    शायद बड़ी साधना से
    बुन रहा होगा
    कोई प्रेम तपस्वी
    कपास से दो जोड़ी
    सूती साड़ियाँ
    जिसे पहन तुम
    कर सको निःसंकोच
    अटखेलियाँ नदियों में
    बन उल्लास वनस्पतियों की,
    अर्पण कर सको
    तुलसी पर
    पत्र अमलतास के
    जो हर पीड़ा हर सके
    पवित्र वृंदा की
    और अंततः कर सको
    स्व-श्रृंगार केशों का
    हर-श्रृंगार के पुष्पों से
    जिसकी दुर्लभ चित्र को
    सामने रख
    वह तपस्वी कर सके
    पुनः अपनी प्रेम साधना!

    ©अपर्णा शाम्भवी

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    तुम तो मंदिर का
    अनवरत जलता लोबान हो
    जिसका स्पर्श वर्जित है
    कई पीढ़ियों से
    परंतु जिसके
    हर-श्रृंगार सज्जित
    केशों की अलौकिक सुगंध से
    व्याकुल हो उठती
    आ रही हैं
    मूर्तियाँ युगों से!

    अपर्णा शाम्भवी


    (Read in caption)

  • aparna_shambhawi 40w

    तितली

    किसी बंजर जमीन पर
    बमुश्किल ही
    उग आता है एक पौधा
    अपनी जड़ें संभाले,
    जिसके हक में होता है
    एक ठिठुरी हुई कली का होना,
    जो खिलने से पूर्व ही
    मुर्झा जाना बेहतर समझती है।
    पर उसे इंतजार रहता है
    एक तितली का
    जिसके पंख फड़फड़ाने से
    नियती के विरुद्ध
    खिल उठती है वो कली,
    जैसे मृत्यु शय्या पर पड़ी स्त्री
    कर रही हो अपना श्रृंगार
    एक अंतिम बार
    और तितली के
    स्पर्श को पा कर
    वो त्याग देती है
    जीवन अपना
    हँसते हुए।
    पुष्प बिछोह से
    व्याकुल पौधा
    वक्त के साथ
    हो जाता है अस्तित्वहीन
    और खत्म हो जाती है
    एक अजन्मी नई कहानी।

    मेरा हृदय वो पौधा है,
    प्रेम वो पुष्प
    और तुम पंख फड़फड़ाती तितली!

    अपर्णा शाम्भवी

  • aparna_shambhawi 42w

    हल्दी( विवाह गीत)

    सोने कटोरी मs हरदी, हरदी केकरा के लागे।
    पियरी-पियरी हरदिया, हरदी सिया जु के लागे।।

    हरदी-चँननवा सेहो घोरूँ हे सहेलिया,
    सिया जु के अंग साजुँ दूब सौं हरदिया।
    मईया सुनैना के दुलरिया, हरदी उनका के लागे।।

    मंगल गनवा सेहो गाबुँ हे सहेलिया,
    अचर फुलेल देबs माँग के सेंदुरिया।
    बाबा जनक के सुकुमsरिया, हरदी उनका के लागे।।

    सिसकी-सिसकी मईया हरदी चढ़ावथिन,
    उबटन लगावथिन हम बड़ भागिन।
    सिया के रs अमर सोहगिया, हरदी उनका के लागे।।

    अमवा के पतिया मैत्री लोढ़े हे सहेलिया,
    बाँधे रेशम डोर हाथ के कँगनवा।
    चलली जे बेटी ससुररिया, हरदी उनका के लागे।।


    अपर्णा शाम्भवी "मैत्री"

  • aparna_shambhawi 44w

    तुम्हें शब्दों में ढूँढूँ
    या कि नगमों में छिपाऊँ,
    तुम्हें गीतों में खो दूँ
    या तरन्नुम में सजाऊँ।

    हे प्राणाधार तुम ही बताओ अब
    करूँ क्या, तुम्हें कैसे पाऊँ।

    मैं शब्द बनूँ भावों की तेरे
    या तुझ-शब्द अक्षर बन आऊँ।
    या कि तेरे रेशमी कुर्ते पर
    एक पश्मीना मफ़लर बन जाऊँ।

    कौन विधि हे प्रिय तुम्हारी
    अलंकार-उपमा हो जाऊँ?
    या कि जप तप कर कर मैं भी
    तुझ-कैलाशी उमा हो जाऊँ?

    -अपर्णा शाम्भवी

  • aparna_shambhawi 47w

    ऐसा नहीं कि मैंने
    नहीं सुना तुम्हारे पुकारने पर,
    बस मैंने पीछे
    मुड़ कर नहीं देखा
    ताकि तुम पुनः
    पुकारो मेरा नाम
    अपने मधुराधरों से।

    तुम्हारे अधरों से
    निकला मेरा नाम
    मुझे उतना ही प्रिय है
    जितना एक नवजात के लिए
    उसका पहला अक्षर!

    अपर्णा शाम्भवी

  • aparna_shambhawi 54w

    मैं तो हार चुकी थी ना,
    तुझमें खुदको!
    और एक तुम,
    बेवकूफ़!
    जीत ही ना सके मुझको!

    एक बात बताना,
    कैसे तुम्हें पता ना चला
    पीछे घड़ी की तरफ
    मेरा मुड़-मुड़ कर देखना,
    तुम्हें!

    एक अलौकिक दुनिया में
    बड़ी कोमलता से
    तुम्हारे घुँघराले केशों को
    निरंतर सुलझाती रही थी मैं
    खुद उलझ कर!
    क्या वो कभी एहसास ना हुआ?

    अच्छा छोड़ो ये बताओ
    के ये जो तुम्हारी
    अनगिनत तस्वीर और मूर्तियाँ
    बनाई थी मैंने
    वो भी खबर ना हुई?
    कैसे मिट्टी के गोले में
    ढूँढ कर तुम्हारे गालों को
    उनपर बनाया था
    तुम्हारे विशाल नयनों को,
    आपस में लिपटी
    दो कलियों जैसी
    तुम्हारे नाज़ुक होंठों को,
    मालती लता सम तुम्हारे
    कारे-घुँघरारे जुल्फ़ों को,
    अपने इन्हीं हाथों से!

    शायद तुमने कभी
    सुना ही नहीं कि जब
    तुम्हारे बुलाने पर
    दौड़ी चली आती थी मैं,
    उसी तरह जैसे
    शम्स के बुलाने पर
    चली जाती हैं बूँदें
    ओस की, मचलती हुई,
    तो झनक उठती थीं
    मेरी पायल मेरी बालियाँ
    तुम्हारा ही नाम ले कर!

    याद है वो कंगन
    सातों रंग की
    हजारों नग वाली!
    क्या कभी देखा नहीं कि
    जो परछाईं हर वर्ण के हर नग पर थी,
    वो बिलकुल, हाँ बिलकुल तुमसी थी!
    और तुम कहते थे,
    यूँ कंगन क्यों निहरती हो!

    अरे! वही बताने तो आए थे
    शब्द मेरे हृदय से,
    प्रकाश की गति से भी तेज
    कि सुनो!
    मैंने तुम्हें हृदय के उस
    स्थान पर स्थापित किया है
    जहाँ से तुम्हारा जाना
    ठीक वैसा ही होगा
    जैसे हृदय गति का विलुप्त हो जाना!
    पर, पर तुम चले गए!

    अब मृत्यु आएगी तो
    किस मुँह से आमंत्रित करूँगी,
    वह भी मुझे त्याग देगी
    प्रेम में हारा एक
    निरर्थक कवि समझ कर!

    हाँ! तुम चले गए,
    किवाड़ को झटकते हुए
    लेकिन उसमें लगा सांकल
    आज भी कंपन करता है
    मेरे अंदर ही अंदर!

    -अपर्णा शाम्भवी

  • aparna_shambhawi 58w

    मिस्मार

    एहतिराम करने लगी हूँ खुद का, मुझे मिस्मार कर दो।
    वज़ूद - ए - ख़ामयाज़ा के तहत, मुझे मिस्मार कर दो।

    मसीहे फ़लसफ़ा सुनाते हैं , फ़लसफ़ी मुंसिफ़ बन गए।
    फ़ानी को क़फ़स ना दो , मुझे मिस्मार कर दो।

    इज़्तिर्रार हूँ , तर्ज़ - ए - आदाब मुख़्तलिफ़ है मेरा।
    मेरी एक उज़्र ना सुनो , मुझे मिस्मार कर दो।

    उस मुसव्विर से इश्क़! तौबा ! अर्श-ए-पतंग थी मैं।
    अब उस मक़ाम पर हूँ , मुझे मिस्मार कर दो।

    अफ़सुर्दा किया उन्होंने जो बख़ील थे दिल के।
    यूँ तकल्लुफ़ न करो , मुझे मिस्मार कर दो।

    तस्कीन मिलेगी बहुत, बहुत ज्यादा मज़ा आएगा।
    ये "पाकी" माज़रत नहीं जानती, मुझे मिस्मार कर दो।

    -अपर्णा शाम्भवी "पाकी"

  • aparna_shambhawi 61w

    कुछ कविताएँ
    प्रेम को समर्पित होती हैं,
    कुछ शब्द
    कविताओं को अर्पित होते हैं,
    कुछ भावनाएँ
    शब्दों की गिरह में होती हैं,
    कुछ तस्वीरें
    भावनाओं की द्योतक होती हैं,
    कुछ क्षण
    तस्वीरों के प्राण होते हैं,
    कुछ आँखें
    रोक देती है क्षण को
    क्षण में उसी क्षण
    जब प्रकाश की गति
    से भी तेज
    आते हैं शब्द
    हृदय की उस स्थान से
    जहाँ एक क्षण ने
    वर्षों से रोक रखा है
    बाकी सभी क्षणों को,
    बस ये कहने कि..
    कि तुम्हें मैंने
    हृदय के उस स्थान में स्थापित किया है,
    जहाँ से तुम्हारा जाना
    वैसा ही होगा जैसे
    हृदय गति का विलुप्त हो जाना
    और शब्द अधरों से
    चले आते हैं वापस मेरे हृदय में,
    और समर्पित कर जाते हैं
    खुद को प्रेम की तीव्रता बढ़ाने को..

    ठीक उसी तरह जैसे
    कुछ प्रेम अपूर्ण रह
    अर्पित कर दिए जाते हैं
    एक अभिशप्त कविता के
    पूर्ण होने में!

    -अपर्णा शाम्भवी

  • aparna_shambhawi 63w

    बमुश्किल ही
    संभाला था दिल को
    कुछ तूफानों से
    के अब ताउम्र
    खुद में ही कैद रहे ये,

    के तौबा!
    तुम नज़र आ बैठे!

    - अपर्णा शाम्भवी

  • aparna_shambhawi 69w

    कविता

    मैं तुझ पे एक कविता लिखता,
    गर तू मेरे साथ होती।

    कैसे तेरे मृग नयनों पर,
    मैंने ये दिल हारा था।
    कैसे तेरी अल्हड़ता पर
    मैंने जान निसारा था।
    मैं तरसता सूना सागर,
    तुम्हें इठलाती सरिता लिखता,
    गर तू मेरे साथ होती।

    मेरे केक हृदय के पाँव में,
    तेरा ही झंकार रहा।
    मेरे हृदय बनारस में तुझ
    गंगा का अलंकार रहा।
    मैं बन कर घन कारी मेघा
    तुम्हें श्रावन की हरिता लिखता,
    गर तू मेरे साथ होती।

    जो क्षण थे हमने साथ बिताए,
    उनपर मैं एक पर्दा लिखता।
    तेरी ज़ुल्फ मेरे कुर्ते का,
    ज़ायका जैसे ज़र्दा लिखता।
    श्रमबिन्दु तेरी बिन्दी पर,
    तुम्हें ही प्रेम की रचिता लिखता,
    गर तू मेरे साथ होती।

    अपर्णा शाम्भवी